बंगाल की खाड़ी में मिली नई मछली, समुद्री जैव विविधता पर नई रोशनी
बंगाल की खाड़ी से मछलियों की एक नई प्रजाति Bathymyrus perplexus की पहचान हुई है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) की गोपालपुर इकाई ने 30 सितंबर 2026 को इसके वैज्ञानिक सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की। यह खोज समुद्री जैव विविधता के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण जोड़ मानी जा रही है, क्योंकि यह प्रजाति भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों में कई स्थानों से दर्ज की गई है।
कैसे हुई इस प्रजाति की पहचान
इस मछली की पहली झलक 2021 में ओडिशा के पारादीप तट से मिले एक नमूने में मिली थी। इसके बाद 2021 से 2025 के बीच पारादीप, पश्चिम बंगाल, गोदावरी क्षेत्र और काकीनाडा से कुल 32 नमूने दर्ज किए गए। 2025 में मिले एक नमूने को विस्तृत अध्ययन के लिए ZSI गोपालपुर केंद्र लाया गया, जहां नमूना-आधारित वर्गिकी और डीएनए विश्लेषण के जरिए इसकी पहचान पुख्ता की गई।
समुद्री तंत्र में इसका महत्व
Bathymyrus perplexus समुद्री मछलियों के उस समूह से जुड़ी है, जिनकी पहचान बाहरी बनावट के साथ-साथ आनुवंशिक जांच के आधार पर की जाती है। यह प्रजाति आमतौर पर समुद्र तट से 50 से 100 मीटर की गहराई में पाई जाती है। इसका शरीर लंबा और बेलनाकार होता है, सिर और थूथन की बनावट अलग पहचान देती है, जबकि शरीर का रंग गुलाबी से धुंधला गुलाबी बताया गया है। सिर के ऊपरी हिस्से पर गहरा काला रंग और आंख से थूथन तक काला निशान इसकी प्रमुख पहचान है।
शोध, प्रकाशन और वैज्ञानिक संदर्भ
इस शोध में ZSI गोपालपुर के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम शामिल थी, जिसमें डॉ. अनिल मोहापात्रा, डॉ. स्मृतिरेखा आचार्य, डॉ. दीपंजन राय, डॉ. स्वरूप रंजन मोहंती, शुभेंदु शेखर मिश्रा और डॉ. जितेंद्र कुमार सुंदरे शामिल रहे। अध्ययन के निष्कर्ष 24 सितंबर 2026 को अमेरिका स्थित Bulletin of Marine Science में प्रकाशित हुए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- Bathymyrus perplexus बंगाल की खाड़ी से पहचानी गई नई मछली प्रजाति है।
- इसका पहला नमूना 2021 में ओडिशा के पारादीप तट से मिला था।
- 2021 से 2025 के बीच इसके 32 नमूने पारादीप, पश्चिम बंगाल, गोदावरी क्षेत्र और काकीनाडा से दर्ज किए गए।
- यह मछली गैर-विषैली है और इसके दोनों जबड़ों तथा सिर क्षेत्र में दांत पाए जाते हैं।
इस खोज से भारत के समुद्री तटीय क्षेत्रों में मौजूद जैव विविधता की व्यापकता का संकेत मिलता है। ऐसे अध्ययन न केवल नई प्रजातियों की पहचान में मदद करते हैं, बल्कि समुद्री पारिस्थितिकी के संरक्षण और वैज्ञानिक वर्गीकरण को भी मजबूत बनाते हैं।