ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर की पहचान के लिए रक्त जांच पर शोध

ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर की पहचान के लिए रक्त जांच पर शोध

विशाखापत्तनम स्थित जीआईटीएएम (मानित विश्वविद्यालय) के शोधकर्ता ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर की शुरुआती अवस्था में पहचान के लिए रक्त जांच विकसित करने पर काम कर रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) से वित्तपोषित यह तीन वर्षीय परियोजना दो करोड़ रुपये से अधिक की है।

ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर की पहचान क्यों कठिन है

स्तन कैंसर के इस प्रकार में ट्यूमर कोशिकाओं में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के रिसेप्टर नहीं पाए जाते तथा एचईआर2 प्रोटीन की अधिकता भी नहीं होती। इन विशेषताओं के कारण यह उन स्तन कैंसरों से अलग है जिनमें संबंधित रिसेप्टर को निशाना बनाने वाली चिकित्सा का उपयोग किया जा सकता है। इसलिए इसकी पहचान और उपचार के लिए अलग दृष्टिकोण की जरूरत होती है।

जीआईटीएएम के जीवन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर रमा राव मल्ला इस परियोजना के मुख्य अन्वेषक हैं। शोध दल का लक्ष्य रक्त के सीरम में ऐसे जैव-संकेतक पहचानना है, जो शुरुआती अवस्था के ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर के निदान में मदद कर सकें। यह शोध फिलहाल संभावित जांच-पद्धति विकसित करने के चरण में है; इसे तैयार और प्रमाणित जांच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

एक्सोसोम और माइक्रोआरएनए पर केंद्रित अध्ययन

परियोजना में सीरम के भीतर मौजूद एक्सोसोम और उनमें पाए जाने वाले माइक्रोआरएनए का अध्ययन किया जाएगा। एक्सोसोम कोशिकाओं से निकलने वाली सूक्ष्म, झिल्ली से घिरी संरचनाएं हैं। वे प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्ल जैसे आणविक पदार्थ एक कोशिका से दूसरी तक पहुंचा सकती हैं। माइक्रोआरएनए छोटे, गैर-कोडिंग आरएनए अणु होते हैं, जो जीन की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।

शोधकर्ता शुरुआती अवस्था के ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाओं के सीरम नमूनों की तुलना स्वस्थ महिलाओं के नमूनों से करेंगे। अनुक्रमण और डिजिटल पीसीआर की सहायता से संभावित माइक्रोआरएनए की पहचान की जाएगी। डिजिटल पीसीआर नमूने को अनेक छोटी अभिक्रियाओं में बांटकर लक्षित न्यूक्लिक अम्लों का पता लगाने और उनकी मात्रा मापने की विधि है।

शोध से जांच किट विकसित करने की योजना

महात्मा गांधी कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान संस्थान और जीआईटीएएम चिकित्सा विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान इस अध्ययन के लिए मरीजों के नमूने उपलब्ध कराएंगे। जीआईटीएएम स्कूल ऑफ साइंस और चिकित्सा संस्थान के शोधकर्ता तथा महात्मा गांधी कैंसर अस्पताल के विशेषज्ञ भी परियोजना में शामिल हैं।

पहचाने गए संभावित जैव-संकेतकों के आधार पर शोध दल मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य शुरुआती अवस्था के मरीजों और स्वस्थ व्यक्तियों के नमूनों में अंतर पहचानना है। परियोजना का अंतिम लक्ष्य किट-आधारित जांच विकसित करना है, लेकिन इसकी उपयोगिता तय करने के लिए शोध और परीक्षण के अगले चरण जरूरी होंगे।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • आईसीएमआर भारत में जैव-चिकित्सकीय अनुसंधान के निर्माण, समन्वय और प्रोत्साहन से जुड़ी शीर्ष संस्था है।
  • ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर में एस्ट्रोजन रिसेप्टर, प्रोजेस्टेरोन रिसेप्टर और एचईआर2 की अधिकता नहीं होती।
  • एक्सोसोम कोशिकाओं के बाहर निकलने वाली सूक्ष्म झिल्ली-बद्ध संरचनाएं हैं, जो आणविक पदार्थों का परिवहन करती हैं।
  • आईसीएमआर की बाह्य अनुदान योजनाएं उसके अपने संस्थानों से बाहर के शोधकर्ताओं और संस्थानों के जैव-चिकित्सकीय शोध को सहायता देती हैं।

यह पहल रक्त में मौजूद आणविक संकेतों के आधार पर कैंसर की पहचान के नए रास्ते तलाशती है। शोध के नतीजे प्रभावी रहे, तो भविष्य में शुरुआती निदान के लिए किट-आधारित जांच का मार्ग खुल सकता है।

Originally written on October 24, 2026 and last modified on October 24, 2026.

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