केरल में मैंग्रोव क्षेत्र बढ़ा, तटीय सुरक्षा को मिल सकता है बल
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) के अध्ययन में केरल के तटीय जिलों में पिछले दशक के दौरान मैंग्रोव क्षेत्र में कुल वृद्धि दर्ज की गई है। अध्ययन में 2017 और 2026 के उपग्रह चित्रों की तुलना की गई। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले केरल पिछले पाँच दशकों में अपने लगभग 90 प्रतिशत मैंग्रोव क्षेत्र को खो चुका था।
उपग्रह चित्रों से सामने आया बदलाव
सीएमएफआरआई के शोधकर्ताओं ने उपग्रह आधारित निगरानी के जरिए मैंग्रोव वनस्पति में हुए बदलावों का आकलन किया। इसके लिए 2017 और 2026 के चित्रों की तुलना की गई और राज्य के तटीय जिलों में कुल मिलाकर मैंग्रोव आवरण बढ़ने की बात सामने आई। अध्ययन के निष्कर्ष 6 नवंबर 2026 को कोच्चि में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए।
तीन दिवसीय यह संगोष्ठी मत्स्यिकी और दूरसंवेदी तकनीक पर केंद्रित थी। इसका आयोजन ट्रेवर प्लैट साइंस फाउंडेशन, कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के रासायनिक समुद्र विज्ञान विभाग, सीएमएफआरआई और मरीन बायोलॉजिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने संयुक्त रूप से किया।
तटीय पारिस्थितिकी के लिए मैंग्रोव का महत्व
मैंग्रोव मछलियों के प्रजनन और शुरुआती विकास के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराते हैं। उनकी जड़ें तटों को चक्रवात और तूफानी लहरों के प्रभाव से बचाने में मदद करती हैं। ये वन वायुमंडल से कार्बन अवशोषित करने में भी योगदान देते हैं। इसलिए इनके क्षेत्र में वृद्धि समुद्री जैव विविधता और तटीय समुदायों की सुरक्षा, दोनों के लिए अहम हो सकती है।
हालांकि, अध्ययन का निष्कर्ष पूरे राज्य में कुल वृद्धि को दर्शाता है; इससे हर तटीय जिले में समान रूप से विस्तार होने का संकेत नहीं मिलता। पिछले दशकों में हुए बड़े नुकसान की पृष्ठभूमि में, नियमित निगरानी और मैंग्रोव आवासों का संरक्षण विशेष महत्व रखते हैं।
निगरानी में दूरसंवेदी तकनीक की भूमिका
उपग्रह चित्रों की समयानुसार तुलना से वनस्पति क्षेत्र में आए बदलावों का पता लगाया जा सकता है। किसी स्थान पर उपग्रह कितनी बार लौटकर उसकी तस्वीर लेता है, इसे उसकी कालिक विभेदन क्षमता कहा जाता है। ऐसी निगरानी से मैंग्रोव जैसे बदलते पारिस्थितिक तंत्रों की स्थिति को समझने में सहायता मिलती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मैंग्रोव की जड़ें लवण को छानने की क्षमता के कारण खारे पानी में जीवित रहने में मदद करती हैं।
- कई मैंग्रोव प्रजातियों में बीज का अंकुरण मूल वृक्ष से जुड़े रहते हुए शुरू हो जाता है; इसे सजीव अंकुरण कहा जाता है।
- मैंग्रोव मछलियों के प्रजनन और शिशु मछलियों के विकास के लिए आश्रय स्थल प्रदान करते हैं।
- कालिक विभेदन से आशय है कि कोई उपग्रह या विमान किसी क्षेत्र का निरीक्षण कितनी बार करता है।
केरल में दर्ज बढ़ोतरी मैंग्रोव संरक्षण के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन बीते दशकों का नुकसान बताता है कि तटीय आवासों की निरंतर निगरानी और सुरक्षा जरूरी बनी हुई है।