ऑस्ट्रेलिया लौटाएगा तमिलनाडु के तीन प्राचीन मंदिरों की दुर्लभ धरोहर
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच सांस्कृतिक सहयोग को नई मजबूती देते हुए ऑस्ट्रेलिया ने जुलाई 2026 में तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से बाहर ले जाई गई तीन महत्वपूर्ण प्राचीन धरोहरों को भारत को लौटाने की घोषणा की है। इनमें चोल काल का देवी भद्रकाली का कांस्य त्रिशूल, ग्रेनाइट से बनी नंदी की प्रतिमा तथा छह मुखों वाले भगवान कार्तिकेय की बेसाल्ट पत्थर की प्रतिमा शामिल हैं। इन दुर्लभ कलाकृतियों की वापसी भारत की सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा और संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
प्राचीन धरोहरों का ऐतिहासिक महत्व
वापस लाई जा रही कलाकृतियों में 11वीं शताब्दी का चोलकालीन कांस्य त्रिशूल देवी भद्रकाली से संबंधित है। इसके साथ 11वीं–12वीं शताब्दी की ग्रेनाइट निर्मित नंदी प्रतिमा तथा 12वीं शताब्दी की छह मुखों वाले भगवान कार्तिकेय की बेसाल्ट प्रतिमा भी शामिल है। भद्रकाली का त्रिशूल और नंदी की प्रतिमा तमिलनाडु के तिरुवरुर जिले के कोल्लुमंगुडी स्थित श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर से संबंधित मानी जाती हैं, जबकि कार्तिकेय की प्रतिमा तंजावुर जिले के मनाम्बडी गांव के नागनाथ स्वामी मंदिर से जुड़ी हुई है। ये सभी दक्षिण भारतीय मंदिर कला और धार्मिक परंपरा की अनमोल धरोहर हैं।
कानूनी प्रक्रिया से हुई वापसी
इन प्राचीन वस्तुओं की वापसी भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच लागू पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी) के तहत की जा रही है। तमिलनाडु की विशेष जांच इकाई ‘आइडल विंग सीआईडी’ ने जांच में पाया कि इन मूर्तियों और कलाकृतियों को अवैध रूप से मंदिरों से हटाकर विदेश भेजा गया था। पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीश सुसान क्रेनन एसी द्वारा किए गए प्रोवेनेंस (स्वामित्व इतिहास) की समीक्षा में इन वस्तुओं के स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड में गंभीर कमियां मिलीं और यह स्थापित नहीं हो सका कि कम से कम दो मूर्तियों का भारत से वैध निर्यात हुआ था।
चोल कला और मंदिर धरोहर का महत्व
चोल वंश ने 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच दक्षिण भारत में शासन किया और इस काल को भारतीय कांस्य मूर्तिकला का स्वर्ण युग माना जाता है। चोलकालीन कांस्य प्रतिमाएं अपनी उत्कृष्ट धातु कला, धार्मिक प्रतीकात्मकता और मंदिर पूजा में उपयोग के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। तमिलनाडु की आइडल विंग सीआईडी मंदिरों से चोरी हुई मूर्तियों, तस्करी और उनकी बरामदगी के मामलों की जांच करने वाली विशेष पुलिस इकाई है, जिसने कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच इस सांस्कृतिक सहयोग का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत ने चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में संरक्षित एक ऑस्ट्रेलियाई फर्स्ट नेशंस पूर्वज के अवशेषों को भी उनके पारंपरिक समुदाय को लौटाने पर सहमति व्यक्त की है। जिन भारतीय धरोहरों की वापसी हो रही है, वे ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी और आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के संग्रह में थीं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी (एमएलएटी) देशों के बीच आपराधिक जांच, साक्ष्य साझा करने और कानूनी सहयोग का महत्वपूर्ण माध्यम है।
- चोल काल भारतीय इतिहास में उत्कृष्ट कांस्य मूर्तिकला और मंदिर स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध माना जाता है।
- नंदी भगवान शिव का पवित्र वाहन माना जाता है और हिंदू मंदिरों में उनका विशेष धार्मिक महत्व है।
- भगवान कार्तिकेय को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मुरुगन, स्कंद और सुब्रह्मण्य नामों से भी पूजा जाता है।
भारत की सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी केवल ऐतिहासिक वस्तुओं की पुनर्प्राप्ति नहीं है, बल्कि यह देश की पहचान, परंपरा और धार्मिक विरासत के संरक्षण का भी प्रतीक है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कानूनी प्रक्रियाओं और प्रभावी जांच एजेंसियों के प्रयासों से ऐसी बहुमूल्य धरोहरों की वापसी भविष्य में भी सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा को और मजबूत बनाएगी।