सीआरपीएफ के 47 वर्षों में पहली बार एक साल बिना ऑपरेशनल मौत
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने 12 लगातार महीने बिना किसी ऑपरेशनल मौत के पूरे किए हैं। बल के लिए 47 वर्षों में यह पहला ऐसा अवसर है। सीआरपीएफ की आखिरी ऑपरेशनल मौत 30 अक्टूबर 2025 को हुई थी। इस उपलब्धि के पीछे बेहतर उपकरण, प्रशिक्षण, रणनीतिक योजना और घायल जवानों को तेजी से उपचार तक पहुंचाने की व्यवस्था को अहम माना गया है।
बेहतर तैयारी और तेज निकासी का असर
सीआरपीएफ के महानिदेशक जी.पी. सिंह के अनुसार, जवानों की सुरक्षा में उपकरणों के उन्नयन और प्रशिक्षण के साथ अभियान संबंधी योजना ने योगदान दिया है। मुठभेड़ या अन्य ऑपरेशनल घटनाओं में घायल कर्मियों को समय पर चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण रहा। बल हर साल औसतन 75 से 80 हवाई एम्बुलेंस उड़ानें संचालित करता है। इनके जरिए घायलों को द्वितीयक और तृतीयक चिकित्सा केंद्रों तक पहुंचाया जाता है, जिनमें दिल्ली का एम्स ट्रॉमा सेंटर भी शामिल है।
संवेदनशील इलाकों में तैनाती जारी
सीआरपीएफ जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में तैनात है। वर्ष 2025 में बल के नौ कर्मियों की मौत हुई, जिनमें से आठ झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के माओवादी प्रभावित इलाकों में कार्रवाई के दौरान मारे गए। वर्ष 2024 में छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में ऑपरेशनल घटनाओं में 12 कर्मियों की जान गई थी। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि एक साल बिना ऑपरेशनल मौत का पड़ाव चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में तैनात बल के लिए उल्लेखनीय है।
उग्रवाद के विरुद्ध अभियान और कर्मियों का कल्याण
यह उपलब्धि उस समय सामने आई जब 30–31 मार्च 2026 के आसपास भारत को माओवाद-मुक्त घोषित किया गया। माओवादी हिंसा के विरुद्ध लंबे समय से जारी कार्रवाई में सीआरपीएफ की अहम भूमिका रही है। बल की विशेष इकाई कोबरा को नक्सल-विरोधी अभियानों के लिए गठित किया गया है और इसके कर्मियों को गुरिल्ला युद्ध का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है।
हालांकि, ऑपरेशनल मौतों में कमी को कर्मियों के स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़ी सभी चुनौतियों का समाधान नहीं माना जा सकता। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अगस्त 2026 में जनवरी से मई 2026 के बीच सीआरपीएफ कर्मियों की आत्महत्या के 19 मामलों पर संज्ञान लिया। वर्ष 2025 में बल के 59 कर्मियों की आत्महत्या से मौत हुई थी। ये आंकड़े मानसिक स्वास्थ्य सहायता और समय पर सहयोग की जरूरत की ओर ध्यान दिलाते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सीआरपीएफ की शुरुआत 1939 में क्राउन रिप्रेजेंटेटिव्स पुलिस के रूप में हुई थी।
- सीआरपीएफ अधिनियम, 1949 के बाद बल का नाम केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल रखा गया।
- सीआरपीएफ देशभर में आंतरिक सुरक्षा, भीड़ नियंत्रण और चुनाव संबंधी कार्यों में तैनात हो सकता है; सामान्यतः यह राज्य पुलिस की सहायता करता है।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग संवैधानिक नहीं, बल्कि वैधानिक निकाय है। इसकी स्थापना का कानूनी आधार मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 है।
एक वर्ष तक ऑपरेशनल मौत न होना सुरक्षा उपायों और चिकित्सा निकासी व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, कर्मियों के मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण पर लगातार ध्यान देना भी आवश्यक है।