वन अधिकार अधिनियम पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट: ‘सनसेट क्लॉज’ और सुधार की सिफारिशें

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा इस माह जारी की गई रिपोर्ट ने भारत में वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act – FRA) की प्रगति की समीक्षा की है और भविष्य के लिए कई सुझाव दिए हैं। रिपोर्ट का शीर्षक है — “Securing Rights, Enabling Futures – Policy Lessons from FRA and Future Pathways”। इस रिपोर्ट में पहली बार “सनसेट क्लॉज” लागू करने पर विचार की बात सामने आई है, जिससे वन अधिकारों की मान्यता की एक अंतिम तिथि तय की जा सके।
क्या है वन अधिकार अधिनियम?
2006 में लागू FRA का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों को उनके पारंपरिक वनों और संसाधनों पर अधिकार प्रदान करना है। वर्तमान में लगभग 2.32 करोड़ एकड़ वन भूमि पर अधिकार दिए जा चुके हैं, जिनमें 1.88 करोड़ एकड़ सामुदायिक अधिकारों के अंतर्गत आते हैं। किंतु एक अध्ययन के अनुसार भारत में 9.88 करोड़ एकड़ भूमि इस अधिनियम के अंतर्गत कवर की जा सकती है — यानी अब तक केवल 18% क्षमता ही उपयोग हुई है।
सनसेट क्लॉज: क्यों और कैसे?
रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों ने अधिकारों की मान्यता के लिए एक ‘अंतिम तिथि’ तय करने की आवश्यकता बताई है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इस विषय पर आम सहमति बनानी चाहिए और ग्राम सभाओं को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए, क्योंकि वही दावों की संतृप्ति का सही मूल्यांकन कर सकती हैं।
प्रमुख सिफारिशें और चुनौतियाँ
- रिकॉर्ड की गड़बड़ियाँ: छत्तीसगढ़ के तीन जिलों में हजारों FRA टाइटल रिकॉर्ड से गायब पाए गए हैं, जिससे रिकॉर्ड-रखाव की गंभीर समस्या उजागर होती है।
- विभागीय संघर्ष: जनजातीय कल्याण और वन विभागों के बीच वन प्रबंधन को लेकर मतभेद हैं। उच्च-स्तरीय समितियाँ गठित करने की सिफारिश की गई है।
- ग्रामसभा की भूमिका: यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ग्रामसभा द्वारा स्वीकृत वन प्रबंधन योजनाएँ वन विभाग की कार्य योजनाओं में किस स्तर पर शामिल हों।
- लिंग समानता: FRA के क्रियान्वयन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने, और योजनाओं में लैंगिक दृष्टिकोण अपनाने की सिफारिश की गई है।
- PM-JANMAN और DAJGUA योजनाएँ: मंत्रालय की पहलों को सराहा गया है, लेकिन दीर्घकालिक कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
- अनुच्छेद 275(1) का उपयोग: केंद्र को सुझाव दिया गया है कि वह FRA और PESA जैसे कानूनों के बेहतर समन्वय के लिए वित्तीय सहायता इस अनुच्छेद के तहत सुनिश्चित करे।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- FRA (2006) का उद्देश्य पारंपरिक वनवासियों को अधिकार प्रदान करना है।
- 9.88 करोड़ एकड़ भूमि संभावित रूप से सामुदायिक अधिकारों के तहत आ सकती है।
- रिपोर्ट का नाम है: “Securing Rights, Enabling Futures” – प्रकाशित: अगस्त 2025।
- FRA की धारा 3(1)(क) समुदाय की जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान पर अधिकार देती है।
- केंद्र सरकार ने MFP (माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस) पर MSP के दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन कई राज्यों ने इसे अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट वन अधिकारों की कार्यान्वयन प्रक्रिया में व्याप्त खामियों को उजागर करती है, लेकिन साथ ही समाधान और समावेशी विकास के रास्ते भी सुझाती है। यदि इन सिफारिशों को उचित तरीके से अपनाया जाए, तो यह भारत के वनवासी समुदायों के लिए सामाजिक न्याय और टिकाऊ आजीविका का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।