डीज़िपी3 की खोज से व्यापक एंटीवायरल उपचार की नई उम्मीद
हैदराबाद स्थित वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं में वायरस के विरुद्ध सक्रिय होने वाली एक नई प्रतिरक्षा प्रक्रिया की पहचान की है। 22 अक्टूबर 2026 को घोषित अध्ययन के अनुसार, डीज़िपी3 नामक प्रोटीन वायरल आरएनए को पहचानकर शरीर की शुरुआती प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को सक्रिय करता है। यह खोज भविष्य में कई तरह के वायरसों के विरुद्ध उपचार विकसित करने के प्रयासों को दिशा दे सकती है।
वायरल आरएनए पहचानकर प्रतिरक्षा जगाता है डीज़िपी3
जन्मजात प्रतिरक्षा शरीर की त्वरित और शुरुआती रक्षा प्रणाली है। कोशिकाओं में मौजूद तंत्र संक्रमण के संकेतों को पहचानते हैं और रोगाणुओं के फैलाव को रोकने के लिए प्रतिक्रिया शुरू करते हैं। शोध में डीज़िपी3 को ऐसी ही भूमिका निभाने वाला प्रोटीन बताया गया है। यह कोशिका के भीतर वायरल आरएनए को पहचानता है। आरएनए कई वायरसों की आनुवंशिक सामग्री होती है, जिसका उपयोग वे अपने प्रोटीन बनाने के लिए करते हैं।
वायरल आरएनए की पहचान के बाद डीज़िपी3 की संरचना में बदलाव होता है और वह सक्रिय हो जाता है। इसके बाद यह माइटोकॉन्ड्रिया तक पहुंचता है। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका के ऊर्जा उत्पादन के लिए प्रमुख अंगक हैं, लेकिन वे कोशिकीय संकेतों के आदान-प्रदान में भी भूमिका निभाते हैं। वहां डीज़िपी3 प्रतिरक्षा रक्षा से जुड़े प्रोटीनों को सक्रिय करता है। इस प्रक्रिया से टाइप-1 इंटरफेरॉन का निर्माण शुरू होता है, जो वायरस के बढ़ने को सीमित करने में मदद करते हैं।
कई वायरसों के विरुद्ध प्रक्रिया की जांच
शोधकर्ताओं के अनुसार, डीज़िपी3 की दोहरी भूमिका है: यह वायरल आरएनए को पहचानता भी है और इसके बाद प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में शामिल प्रोटीनों को सक्रिय भी करता है। टीम ने इस प्रक्रिया का परीक्षण सार्स-कोव-2, चिकनगुनिया वायरस और जापानी मस्तिष्क-ज्वर वायरस के विरुद्ध किया। ये क्रमशः कोविड-19, चिकनगुनिया और जापानी मस्तिष्क-ज्वर रोगों के कारक हैं।
सीसीएमबी के वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संतोष चौहान ने शोध का नेतृत्व किया, जबकि डॉ. रिंकू साहू इसके प्रथम लेखक थे। अध्ययन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से किया गया और इसके निष्कर्ष ‘द ईएमबीओ जर्नल’ में प्रकाशित हुए। भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने इस शोध को वित्तीय सहायता दी।
दवा विकास की दिशा में अगला कदम
शोध दल अब छोटे अणुओं पर आधारित संभावित दवा उम्मीदवार विकसित कर रहा है। इनका उद्देश्य डीज़िपी3 की गतिविधि को लक्षित कर उसे बढ़ावा देना है। यदि आगे के अनुसंधान में यह तरीका प्रभावी सिद्ध होता है, तो इससे अलग-अलग वायरसों के विरुद्ध व्यापक असर वाले उपचार की संभावना का आकलन किया जा सकेगा। हालांकि, यह अभी दवा विकास की शुरुआती शोध दिशा है; इसे तैयार उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सीसीएमबी, सीएसआईआर की घटक प्रयोगशाला है और हैदराबाद में स्थित है।
- टाइप-1 इंटरफेरॉन में इंटरफेरॉन-अल्फा और इंटरफेरॉन-बीटा शामिल हैं।
- सार्स-कोव-2 कोविड-19 का, जबकि जापानी मस्तिष्क-ज्वर वायरस जापानी मस्तिष्क-ज्वर रोग का कारक है।
- जैव प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार का विभाग है और इस अध्ययन को उससे वित्तीय सहायता मिली।
डीज़िपी3 की यह पहचान बताती है कि कोशिका वायरल संक्रमण को पहचानकर अपनी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कैसे शुरू कर सकती है। आगे का शोध तय करेगा कि इस प्रक्रिया को दवा के रूप में कितना उपयोगी बनाया जा सकता है।