चंबल में भारतीय स्किमर की वापसी, संरक्षण पर बढ़ी नजर
राजस्थान के धौलपुर जिले में चंबल नदी के रेतीले द्वीपों पर भारतीय स्किमर लौट आए हैं। नवंबर 2026 की शुरुआत में इन पक्षियों की मौजूदगी के बाद वन विभाग ने उनकी निगरानी और मौसमी आवागमन व प्रजनन स्थलों की सुरक्षा की तैयारी शुरू की है। स्थानीय तौर पर इन्हें पंचिरा कहा जाता है।
चंबल के रेतीले द्वीप हैं अहम आश्रय
भारतीय स्किमर आमतौर पर अक्टूबर-नवंबर में चंबल क्षेत्र में आते हैं और मानसून शुरू होने के साथ जून में लौट जाते हैं। ये नदी के रेतीले टापुओं पर घोंसले बनाते हैं; इनका प्रजनन काल मार्च से जून तक रहता है। धौलपुर में राजघाट, अंडवा पुरैनी, डांग बसई और मौरौली जैसे स्थलों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य इस प्रजाति के प्रजनन के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल है। भारत में भारतीय स्किमर की वैश्विक प्रजनन आबादी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाया जाता है। इसलिए चंबल के नदी-द्वीपों और उनके आसपास के पर्यावासों की स्थिति इस पक्षी के संरक्षण के लिए विशेष महत्व रखती है।
संरक्षण प्रयासों से बढ़ी स्थानीय संख्या
संरक्षणवादी परवीन शेख और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ने 2017 में ‘गार्डियन्स ऑफ द स्किमर’ कार्यक्रम शुरू किया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, धौलपुर क्षेत्र में इन पक्षियों की संख्या 2017 के लगभग 400 से बढ़कर 2025 में करीब 1,000 हो गई। इसी अवधि में घोंसलों के सफलतापूर्वक सुरक्षित रहने की दर 14 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत बताई गई।
इन प्रयासों में स्थानीय निगरानी और घोंसलों वाले क्षेत्रों की सुरक्षा अहम है। हालांकि, अवैध रेत खनन, नदी के प्रवाह में बदलाव, प्रदूषण और मानवीय गतिविधियां इनके आवास को प्रभावित कर सकती हैं। शिकारी जीवों और मवेशियों से भी अंडों तथा घोंसलों को खतरा रहता है।
संरक्षण के सामने नदी-तंत्र की चुनौतियां
स्किमर का प्रजनन रेतीले द्वीपों की उपलब्धता और नदी के प्राकृतिक हालात पर निर्भर करता है। रेत खनन या प्रवाह में बदलाव से घोंसले बनाने की जगह प्रभावित हो सकती है। वहीं, लोगों की आवाजाही और मवेशियों की मौजूदगी से अंडों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। इस कारण मौसमी निगरानी के साथ नदी-तटों पर व्यवधान कम करना संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारतीय स्किमर रिन्कॉप्स वंश की तीन प्रजातियों में से एक है और लैरीडे कुल में आता है।
- यह पानी के ऊपर उड़ते समय अपनी लंबी निचली चोंच को सतह पर चलाकर जलीय शिकार पकड़ता है।
- यह पक्षी अक्सर कॉलोनी में प्रजनन करता है; एक कॉलोनी में 40 जोड़े तक हो सकते हैं।
- कभी-कभी यह नदी टर्न के घोंसलों में अंडे देता है; इसे सीमित अंतर-प्रजातीय परजीविता कहा जाता है।
चंबल में भारतीय स्किमर की वापसी इस नदी-पर्यावास के महत्व को रेखांकित करती है। घोंसलों की सुरक्षा और मानवीय दबाव पर नियंत्रण इसके संरक्षण के लिए जरूरी हैं।