गंगोत्री ग्लेशियर पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: IIT इंदौर के अध्ययन में चौंकाने वाले खुलासे

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के एक समूह द्वारा किए गए नवीनतम अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन का गहरा प्रभाव गंगोत्री ग्लेशियर प्रणाली (Gangotri Glacier System – GGS) पर पड़ रहा है। यह वही ग्लेशियर है जो गंगा नदी की उत्पत्ति का मुख्य स्रोत माना जाता है और उत्तर भारत की जीवनरेखा के रूप में देखा जाता है।

चार दशकों का गहन विश्लेषण

यह अध्ययन “Hydrological contributions of snow and glacier melt from the Gangotri glacier system and their climatic controls since 1980” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, जिसमें 1980 से 2020 तक के उपग्रह और वास्तविक आंकड़ों का उपयोग किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि तापमान में लगातार वृद्धि के कारण हिमपात की मात्रा में गिरावट आई है, जिससे बर्फ पिघलने से मिलने वाले पानी की मात्रा में भी कमी आई है।

बदलता प्रवाह संरचना

अध्ययन के अनुसार पिछले 40 वर्षों में गंगोत्री ग्लेशियर से निकलने वाले जल का प्रमुख स्रोत हिमपिघलन (Snowmelt) रहा है, जो औसतन 64% वार्षिक प्रवाह के लिए उत्तरदायी रहा है। इसके बाद ग्लेशियर मेल्ट (21%), वर्षा जनित प्रवाह (11%) और बेस फ्लो (4%) रहे।
लेकिन एक चिंता की बात यह है कि हिमपिघलन का योगदान 1980-90 के दशक में 73% था जो 2010-20 के दशक में घटकर 63% हो गया। हालांकि 2000-10 में यह गिरकर 52% तक चला गया था, लेकिन 2010-20 में यह थोड़ा बढ़ा — जो शीत ऋतु में तापमान में गिरावट और वर्षा में वृद्धि के कारण हुआ।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • गंगोत्री ग्लेशियर से गंगा नदी का उद्गम होता है, यह केंद्रीय हिमालय में स्थित है।
  • 1980-2020 के दौरान औसत वार्षिक तापमान में 0.5°C की वृद्धि हुई है।
  • गंगोत्री क्षेत्र में अधिकतम वार्षिक डिस्चार्ज 2001-10 के दौरान 28.9 घन मीटर/सेकंड दर्ज किया गया।
  • हिमालयी ग्लेशियर औसतन 46 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष मोटाई खो रहे हैं।

तापमान वृद्धि और हाइड्रोलॉजिकल परिवर्तन

रिपोर्ट बताती है कि 1990 के दशक के बाद से गर्मियों में बर्फ के जल्दी पिघलने के कारण अधिकतम प्रवाह (peak discharge) अब अगस्त से खिसककर जुलाई में हो गया है। इससे जल विद्युत उत्पादन, सिंचाई और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जल सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
साथ ही, वर्षा जनित प्रवाह और बेस फ्लो में वृद्धि देखी गई है, जो तापमान वृद्धि के कारण होने वाले जल चक्र परिवर्तनों की ओर संकेत करता है।

अन्य वैज्ञानिकों की राय

जल विशेषज्ञ डॉ. कल्याण रुद्र ने भी इस शोध की पुष्टि करते हुए बताया कि वे पिछले तीन दशकों से गंगोत्री ग्लेशियर के मुहाने (snout) में लगातार पीछे हटने की प्रक्रिया देख रहे हैं। वहीं IIT खड़गपुर के अभिजीत मुखर्जी ने लद्दाख में भी समान पिघलन प्रवृत्तियों की ओर संकेत किया है।

निष्कर्ष

गंगोत्री ग्लेशियर पर यह अध्ययन स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन ने भारत की एक प्रमुख जल स्रोत प्रणाली को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। हिमपात की कमी, बर्फ पिघलने के पैटर्न में बदलाव और तापमान वृद्धि जैसे कारकों का संयुक्त प्रभाव भारत की जल सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है। यह समय है जब नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और आम जनता को मिलकर सतत और पर्यावरण अनुकूल उपायों को अपनाने की आवश्यकता है।

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