कोयला क्षेत्रों में पर्यावरण ही नहीं, स्वास्थ्य प्रभावों का भी हो मूल्यांकन: नई रिपोर्ट की सिफारिश

भारत में कोयले का उपयोग अगले कई दशकों तक ऊर्जा का मुख्य स्रोत बना रहेगा, लेकिन इसके साथ ही इसके पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभावों को लेकर नई चिंता जताई गई है। हाल ही में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में एक रिपोर्ट “Regulating Coal Operations: Environmental and Social Impacts through the Lens of the National Green Tribunal” जारी की गई। यह रिपोर्ट गैर-लाभकारी संस्था विकल्प द्वारा प्रकाशित की गई है, जिसके प्रमुख लेखक श्रीपाद धर्माधिकारी और कुश तनवानी हैं। रिपोर्ट में विशेष रूप से नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (NGT) में दर्ज आठ मामलों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें कोयला परिवहन, भंडारण, फ्लाई ऐश प्रबंधन और जल अपशिष्ट निपटान शामिल हैं।

कोयला: ऊर्जा का स्तंभ, लेकिन भारी सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत पर

2022-23 में भारत की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता का 73% हिस्सा कोयले और लिग्नाइट आधारित था, जो 2031-32 तक भी लगभग 50% बना रहेगा। लेकिन थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाले वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण के साथ-साथ भूमि क्षरण और सामाजिक विस्थापन जैसे कई गंभीर प्रभाव भी सामने आते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में फ्लाई ऐश और कोयले की अनियंत्रित ढुलाई के कारण पानी के स्रोत जहरीले हो गए हैं, भूमि की उर्वरता घट गई है, और जैव विविधता को नुकसान पहुँचा है। तमिलनाडु के एन्नोर में फ्लाई ऐश ने नदी, नहर और बाढ़ मैदानों को जाम कर दिया, जिससे जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ गया। फ्लाई ऐश में मौजूद सिलिका, कैडमियम और सीसा जैसे तत्वों से सिलिकोसिस, कैंसर और स्नायु रोगों का खतरा बढ़ा है।

न्यायिक प्रक्रिया और नियामकीय विफलताएँ

NGT द्वारा लगाए गए मुआवज़े अक्सर विवादों में रहे हैं और प्रभावित लोगों तक समय पर नहीं पहुँच सके हैं। जैसे, मेजिया मामले में समिति द्वारा सुझाया गया ₹128.56 करोड़ का मुआवज़ा NGT ने घटाकर ₹20 करोड़ कर दिया। चंद्रपुर मामले में हर महीने ₹1 करोड़ का अतिरिक्त जुर्माना भी तय किया गया, लेकिन इन मामलों में राशि का वितरण अक्सर उच्च न्यायालयों में लंबित रहा।
NGT ने कई मामलों में पर्यावरणीय मरम्मत को अनिवार्य बताया, जैसे सोनभद्र और एन्नोर मामलों में पर्यावरण पुनर्स्थापना योजनाएँ बनाना अनिवार्य किया गया। फिर भी, निगरानी की कमी और समयबद्ध कार्रवाई के अभाव में इन आदेशों का पूर्ण कार्यान्वयन नहीं हो सका।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • रिपोर्ट “Regulating Coal Operations…” 26 अगस्त 2025 को जारी हुई।
  • भारत की कुल बिजली उत्पादन में 2022-23 में कोयले का योगदान 73% था।
  • फ्लाई ऐश से निकलने वाले भारी धातुओं जैसे कैडमियम और सीसा से बच्चों और वयस्कों में कैंसर का खतरा पाया गया।
  • एन्नोर में PM10 प्रदूषण स्तर स्वीकार्य सीमा (100 μg/m3) से पाँच गुना अधिक (460 μg/m3) दर्ज किया गया।

रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि कोयला क्षेत्रों में केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य प्रभावों का भी मूल्यांकन किया जाए। प्रभावित क्षेत्रों की सतत निगरानी की जाए — जैसे वायु और जल गुणवत्ता, मृदा स्वास्थ्य, जैव विविधता और समुदायों की भलाई पर पड़ने वाले प्रभाव।
प्रभावित समुदायों, नागरिक संगठनों और स्वतंत्र विशेषज्ञों को निगरानी और पुनर्स्थापना समितियों में शामिल किया जाए। इसके साथ ही, स्वास्थ्य प्रभावों का आकलन कोयला खनन और बिजली संयंत्रों के क्षेत्रों में अनिवार्य बनाया जाए।
सिर्फ आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है — उनके पालन की निगरानी और समयबद्ध कार्यान्वयन की सख्त ज़रूरत है। रिपोर्ट ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक हो, तो NGT मामलों को निपटाए बिना लंबित रख सकती है ताकि नियमित प्रगति रिपोर्ट ली जा सके।
यह स्पष्ट है कि ‘जस्ट ट्रांजिशन’ (संतुलित ऊर्जा परिवर्तन) की दिशा में भारत का कदम तभी सार्थक होगा जब कोयला क्षेत्रों में पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और स्वास्थ्य सुधार को प्राथमिकता दी जाए। यह सिर्फ ऊर्जा की बात नहीं, बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगी और आजीविका से जुड़ा प्रश्न है।

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