असम के राजा पृथु: इतिहास के एक नए नायक की पहचान और महत्व

हाल ही में असम सरकार ने गुवाहाटी के हृदयस्थल में बन रहे एक नए फ्लाईओवर का नाम 13वीं सदी के कामरूप शासक पृथु के नाम पर रखने का निर्णय लिया। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इसे “भारत की आत्मा के रक्षक असम” की प्रतीकात्मक स्मृति बताया। उनका कहना था कि जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा को नष्ट किया, तब पृथु ने असम की पवित्र भूमि से उठकर उसका प्रतिशोध लिया। यह ऐतिहासिक व्याख्या अब पृथु को लाचित बरफुकन जैसे असम के अन्य वीरों की तरह सांस्कृतिक नायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।

बख्तियार खिलजी और असम की टक्कर

बख्तियार खिलजी 12वीं सदी के अंत में भारत में इस्लामी शासन की नींव रखने वाले मुहम्मद गोरी का सैन्य सेनापति था। उसने पूर्वी भारत में कई हमले किए और नालंदा विश्वविद्यालय के विध्वंस के लिए जाना जाता है। 1206 ई. में उसके द्वारा असम (कामरूप) की ओर किया गया पहला तुर्क-अफगान हमला विफल रहा।
उत्तर गुवाहाटी के कनाई बरसी बुवा क्षेत्र में एक शिलालेख में दर्ज है कि तुर्क सेना को “साका” क्षेत्र में नष्ट कर दिया गया था, पर किसी स्थानीय शासक का नाम नहीं लिया गया। एक फारसी ग्रंथ ‘तबकात-ए-नासिरी’ में ‘कामरुद के राय’ द्वारा खिलजी को पराजित करने का वर्णन मिलता है, जिसमें एक शासक ‘बार्तु’ का उल्लेख है। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर इतिहासकार कनक लाल बरुआ ने 1933 में राजा पृथु को वह शासक माना जिसने बख्तियार की सेना को नष्ट किया था।

राजा पृथु की पहचान और हालिया लोकप्रियता

हालांकि, लंबे समय तक इतिहासकार पृथु की पहचान को लेकर आश्वस्त नहीं थे। गुवाहाटी विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त इतिहासकार आई एस मुम्ताज़ा खातून का मानना है कि उस काल के स्वदेशी स्रोत नहीं मिलते, और ‘महाराजा’ की उपाधि संदिग्ध हो सकती है।
राजा पृथु को एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में उभारने का श्रेय हाल के वर्षों में संघ विचारधारा से जुड़ी संस्था अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना (ABISY) के प्रयासों को दिया जा रहा है। असम के इतिहासकार रक्तिम पातर की 2021 में प्रकाशित पुस्तक ‘Maharaja Prithu: The Unsung Warrior King Who Annihilated Bakhtiyar Khalji’ ने इस विमर्श को गति दी। इस विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठियां, लेख और शैक्षणिक चर्चाएं बढ़ रही हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • बख्तियार खिलजी ने 1206 ई. में कामरूप (असम) पर हमला किया था, जो विफल रहा।
  • कनाई बरसी बुवा का शिलालेख तुर्कों की पराजय का प्रमाण माना जाता है।
  • राजा पृथु का उल्लेख पहली बार 1933 में कनक लाल बरुआ की पुस्तक में आया।
  • हाल के वर्षों में संघ परिवार से जुड़ी संस्थाओं ने पृथु को एक ऐतिहासिक नायक के रूप में प्रचारित किया है।

इतिहासकारों का मानना है कि यह कालखंड – तीन प्रमुख राजवंशों के पतन और अहोम व कोच साम्राज्यों के उदय के बीच का – असम के इतिहास का एक संक्रमण काल है, जिस पर कम शोध हुआ है। इसलिए पृथु के जीवन और शासन पर अधिक शोध की आवश्यकता है, जिससे यह समझा जा सके कि उस युग की सामाजिक-राजनीतिक संरचना कैसी थी।
राजा पृथु का उदय केवल एक व्यक्ति की वीरता का वर्णन नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन भूले-बिसरे अध्यायों को पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया का हिस्सा है, जो आज के सांस्कृतिक विमर्श में नया स्थान पा रहे हैं।

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