COP30 में भारत की पहल: न्यायसंगत और सहयोगात्मक जलवायु कार्रवाई की मांग

COP30 में भारत की पहल: न्यायसंगत और सहयोगात्मक जलवायु कार्रवाई की मांग

ब्राज़ील के बेलेम शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP30) में भारत ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई के लिए मज़बूत बहुपक्षवाद (Multilateralism) और पेरिस समझौते के सिद्धांतों के सख्त पालन की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने स्पष्ट कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास न्यायसंगत, लोगों के केंद्र में आधारित और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भावना से प्रेरित होने चाहिए।

बहुपक्षीय जलवायु ढाँचे की रक्षा में भारत की भूमिका

भारत ने ‘लाइक-माइंडेड डेवलपिंग कंट्रीज़’ (LMDCs) समूह का प्रतिनिधित्व करते हुए संयुक्त अधिवेशन में कहा कि COP30 पेरिस समझौते की दसवीं वर्षगांठ और संयुक्त राष्ट्र जलवायु ढाँचे के तीन दशकों का प्रतीक है। भारत ने चेतावनी दी कि यदि पेरिस समझौते के संतुलन और मूल सिद्धांतों की पुनर्व्याख्या की गई तो इससे समानता और “साझी किंतु भिन्न जिम्मेदारियों” (Common But Differentiated Responsibilities) की भावना कमजोर पड़ेगी। भारत ने यह भी कहा कि कुछ विकसित देशों द्वारा उठाए जा रहे एकतरफा व्यापारिक कदम जलवायु सहयोग को नुकसान पहुँचा रहे हैं और इन्हें प्रतिबद्धताओं को पुनः परिभाषित करने के उपकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

वित्त और प्रौद्योगिकी: सबसे बड़ी चुनौतियाँ

भारत ने जोर देकर कहा कि वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण में कमी विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। LMDC देशों ने दोहराया कि पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकसित देशों की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे जलवायु वित्त प्रदान करें। भारत ने इस मुद्दे पर चल रही अनौपचारिक चर्चाओं का स्वागत किया, परंतु कहा कि ठोस प्रगति के बिना यह प्रक्रिया विश्वास को कमजोर करती है और जलवायु लक्ष्यों की गति धीमी कर देती है।

अनुकूलन और न्यायसंगत संक्रमण पर भारत का जोर

भारत ने COP30 को “अनुकूलन का COP” (COP of Adaptation) घोषित करने की वकालत की। भारत का मानना है कि अनुकूलन वित्त (Adaptation Finance) की उपलब्धता मौजूदा जरूरतों से लगभग 15 गुना कम है। इसलिए सभी देशों को ठोस राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएँ (National Adaptation Plans) तैयार कर उन्हें वित्तीय समर्थन से जोड़ना चाहिए।समानांतर रूप से, भारत ने कहा कि “जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम” (Just Transition Work Programme) में न्याय, समावेशन और सामाजिक समानता के सिद्धांतों को समाहित किया जाए, ताकि कोई भी समुदाय जलवायु परिवर्तन की दिशा में होने वाले परिवर्तन से पीछे न छूटे।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • COP30 में भारत ने LMDC समूह का प्रतिनिधित्व किया।
  • पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के अनुसार विकसित देशों के लिए जलवायु वित्त प्रदान करना कानूनी दायित्व है।
  • अनुकूलन की जरूरतें वर्तमान वित्त प्रवाह से लगभग 15 गुना अधिक हैं।
  • “जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम” न्यायसंगत और समावेशी जलवायु परिवर्तन को समर्थन देने की रूपरेखा है।

वैश्विक “जस्ट ट्रांजिशन मेकैनिज़्म” की दिशा में पहल

विकासशील देशों के समूह G77 और चीन ने मिलकर एक संस्थागत “जस्ट ट्रांजिशन मेकैनिज़्म” स्थापित करने की मांग रखी है, जो वित्त, प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण के प्रयासों का समन्वय कर सके। चीन ने इसे एक वैश्विक जिम्मेदारी बताया, जबकि नाइजीरिया ने संसाधन-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए रियायती वित्त की आवश्यकता पर बल दिया। ऑस्ट्रेलिया ने भी स्वीकार किया कि सहयोग को व्यवहारिक रूप में बदलने के लिए और गहराई से मिलकर काम करना आवश्यक है।संभावना है कि इस COP का प्रमुख परिणाम यही तंत्र बने, जो भविष्य में देशों को जलवायु-लचीला और न्यायसंगत विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक नया ढांचा प्रदान करेगा।

Originally written on November 13, 2025 and last modified on November 13, 2025.

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