ALMM सूची-III: भारत के सौर विनिर्माण को मजबूती देने की पहल
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने हाल ही में Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) ढांचे के तहत सूची-III की शुरुआत की है, जो इंगोट्स और वेफर्स पर केंद्रित है। यह नई सूची 1 जून 2028 से लागू होगी और भारत के सौर विनिर्माण क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इस पहल का उद्देश्य सौर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना और आयात पर निर्भरता को कम करना है।
ALMM ढांचे का परिचय
ALMM एक गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाला तंत्र है, जिसे 2019 में लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत में उपयोग होने वाले सौर उपकरण विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाले हों। इस व्यवस्था के तहत केवल वही मॉडल और निर्माता सरकारी परियोजनाओं के लिए पात्र होते हैं, जो ALMM सूची में शामिल होते हैं। इस ढांचे का संचालन MNRE द्वारा किया जाता है।
ALMM की स्तरीय संरचना
ALMM ढांचा विभिन्न स्तरों में विभाजित है। सूची-I में सौर पीवी मॉड्यूल के निर्माता और मॉडल शामिल हैं, जबकि सूची-II में सौर सेल्स को शामिल किया गया है। अब सूची-III के माध्यम से इंगोट्स और वेफर्स जैसे प्रारंभिक स्तर के घटकों को भी इस प्रणाली में शामिल किया गया है। इससे सौर उत्पादन की पूरी प्रक्रिया—कच्चे माल से लेकर तैयार मॉड्यूल तक—पर नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सकेगा।
पात्रता और अनुपालन की शर्तें
केवल ALMM में सूचीबद्ध निर्माता और मॉडल ही सरकारी योजनाओं, नेट-मीटरिंग परियोजनाओं और सरकारी आपूर्ति से जुड़ी परियोजनाओं में भाग ले सकते हैं। इससे गुणवत्ता मानकों का पालन सुनिश्चित होता है और घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलता है। यह ढांचा घरेलू सामग्री आवश्यकताओं (DCR) को भी मजबूत करता है, जिससे स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन मिलता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- ALMM को 2019 में MNRE द्वारा लागू किया गया था।
- सूची-I में सौर मॉड्यूल, सूची-II में सौर सेल्स और सूची-III में इंगोट्स व वेफर्स शामिल हैं।
- केवल ALMM-स्वीकृत उत्पाद ही सरकारी सौर परियोजनाओं में उपयोग किए जा सकते हैं।
- यह ढांचा घरेलू सामग्री आवश्यकता (DCR) नीति को सुदृढ़ करता है।
कार्यान्वयन और संक्रमण व्यवस्था
नई व्यवस्था को लागू करने के लिए “ग्रैंडफादरिंग” प्रावधान भी शामिल किए गए हैं, जिससे पहले से चल रही परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से नए नियमों का पालन करने से छूट मिलती है। 2028 तक का समय उद्योग के हितधारकों को नए मानकों के अनुसार खुद को ढालने का अवसर देता है। यह पहल भारत को सौर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।