2025 में भारत में 166 बाघों की मौत: संरक्षण की सफलता के साथ उभरती चुनौतियाँ
भारत में बाघों की बढ़ती संख्या के बावजूद वर्ष 2025 में बाघ मृत्यु दर में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में कुल 166 बाघों की मृत्यु हुई, जो कि 2024 में दर्ज 126 मौतों की तुलना में काफी अधिक है। यह आंकड़े वन्यजीव संरक्षण की दिशा में कई उपलब्धियों के साथ-साथ नए खतरों और दबावों की ओर भी संकेत करते हैं।
बाघ संरक्षण को लेकर भारत वैश्विक स्तर पर प्रशंसा प्राप्त कर चुका है, लेकिन इस वर्ष का डेटा दिखाता है कि बढ़ती जनसंख्या के साथ-साथ पारिस्थितिक तंत्र, निवास स्थान और सुरक्षा उपायों में भी सुधार की सख्त आवश्यकता है।
राज्यवार बाघ मृत्यु दर के आंकड़े
वर्ष 2025 में बाघों की मृत्यु दर में सर्वाधिक योगदान मध्य प्रदेश का रहा, जहां 55 बाघों की मौत दर्ज की गई। इसके बाद महाराष्ट्र में 38, केरल में 13 और असम में 12 बाघों की मौत हुई। कुल मृत्यु में से 31 बाघ शावक थे, जो युवा बाघों की असुरक्षा और संवेदनशीलता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि युवा बाघों के लिए प्रादेशिक संघर्ष और सुरक्षित आवास की कमी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
प्रादेशिक संघर्ष और निवास स्थान की सीमाएँ
जैसे-जैसे संरक्षित क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे उनमें स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा भी तीव्र होती जा रही है। मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जहाँ बाघों की संख्या में बीते दशक में तेजी से वृद्धि हुई है, वहाँ अब निवास स्थान सीमित हो गए हैं, जिससे बाघों के बीच हिंसक टकराव बढ़ने लगे हैं। विशेष रूप से कोर फॉरेस्ट क्षेत्रों में प्रादेशिक लड़ाइयाँ बाघों की प्राकृतिक मृत्यु का प्रमुख कारण बन रही हैं।
मृत्यु के कारण: प्राकृतिक, शिकार और करंट
मध्य प्रदेश में अधिकांश बाघों की मौतें प्राकृतिक कारणों से हुई हैं, जिनमें आपसी संघर्ष के दौरान आई गंभीर चोटें प्रमुख हैं। हालांकि कुछ मामले शिकार और अवैध गतिविधियों से भी जुड़े पाए गए हैं। पूरे देश में सात बाघों की मौत बिजली के झटके (इलेक्ट्रोक्यूशन) से हुई। अधिकारियों के अनुसार, 20 महीने की उम्र के बाद अपनी मां से अलग होकर नए इलाके की तलाश में निकलने वाले युवा नर बाघ सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में विश्व की लगभग 75% बाघ जनसंख्या निवास करती है।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) का गठन वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत किया गया है।
- बाघों के प्रसरण (dispersal) से युवा बाघों में संघर्ष और जोखिम बढ़ते हैं।
- आवास का विखंडन (fragmentation) वन्यजीवों की आवाजाही को बाधित करता है।
संरक्षण की सफलता के साथ उभरती चुनौतियाँ
2023 में जारी अखिल भारतीय बाघ गणना के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या 2018 के 2,967 से बढ़कर 2022 में 3,682 हो गई, जो लगभग 6% वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाती है। यह संरक्षण की दृष्टि से एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल संख्या में वृद्धि पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ बड़े और सुरक्षित आवास, निर्बाध वन्यजीव गलियारे और मानव‑वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए ठोस रणनीति की आवश्यकता है।
भारत को अपनी वैश्विक बाघ संरक्षण छवि को बनाए रखने के लिए अब संरक्षण के अगले चरण में प्रवेश करना होगा, जहाँ संख्या के साथ-साथ गुणवत्ता, सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थायित्व भी प्राथमिकता हों।