हृदयाघात की शीघ्र पहचान के लिए भारतीय शोधकर्ताओं ने विकसित किया सस्ता और लचीला बायोसेंसर
भारतीय शोधकर्ताओं ने एक सस्ता, लचीला और पोर्टेबल बायोसेंसर विकसित किया है जो हृदयाघात के प्रारंभिक चरण में जारी होने वाले मायोग्लोबिन प्रोटीन का त्वरित पता लगाने में सक्षम है। यह नवाचार कम संसाधनों वाले स्वास्थ्य क्षेत्रों में भी त्वरित और सुलभ कार्डियक जांच को संभव बनाकर शीघ्र निदान को गति देगा।
भारत-ऑस्ट्रेलिया संयुक्त शोध सहयोग
इस बायोसेंसर को BITS पिलानी हैदराबाद और RMIT यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त शोध कार्यक्रम के अंतर्गत डॉक्टोरल शोधकर्ता मोहसिना अफरोज़ द्वारा विकसित किया गया है। इस शोध में सामग्री विज्ञान, बायोसेंसिंग और जैव-चिकित्सीय अभियांत्रिकी का समन्वय है, जो भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच उन्नत स्वास्थ्य तकनीकों में सहयोग को सुदृढ़ करता है।
ग्रेफीन-आधारित मायोग्लोबिन पहचान प्रणाली
यह नवीनतम सेंसर ग्रेफीन (Graphene) पर आधारित है, जो मायोग्लोबिन नामक प्रोटीन का पता लगाता है।
- मायोग्लोबिन हृदय मांसपेशी में चोट लगने के तुरंत बाद रक्त में पाया जाता है।
- इसकी प्रारंभिक पहचान डॉक्टरों को हृदय संबंधी घटनाओं का समय रहते निदान करने में मदद करती है, जो उपचार के परिणामों को बेहतर बनाता है।
किफायती और पोर्टेबल डायग्नोस्टिक समाधान
पारंपरिक कार्डियक परीक्षण जहां मंहगे, समय लेने वाले और प्रयोगशाला-आधारित होते हैं, वहीं यह नया बायोसेंसर:
- हल्का, लचीला और कम लागत वाला है।
- पोर्टेबल और पॉइंट-ऑफ-केयर परीक्षण के लिए उपयुक्त है।
- इसकी तकनीक के लिए एक भारतीय पेटेंट भी दायर किया गया है।
मुख्य अन्वेषक संकेत गोयल ने बताया कि इस अनुसंधान का उद्देश्य उन्नत संवेदन तकनीक को सुलभ और सस्ते कार्डियक डायग्नोस्टिक्स में रूपांतरित करना है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मायोग्लोबिन हृदय मांसपेशी को क्षति पहुँचने पर शीघ्र रक्त में छोड़ा जाने वाला एक प्रारंभिक बायोमार्कर है।
- ग्रेफीन उच्च चालकता और संवेदनशीलता के कारण बायोसेंसरों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।
- पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक्स से केंद्रीय प्रयोगशालाओं पर निर्भरता घटती है।
- भारत-ऑस्ट्रेलिया सहयोग स्वास्थ्य नवाचार को बढ़ावा देता है।
ग्रामीण और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा में संभावित प्रभाव
यह तकनीक विशेष रूप से ग्रामीण अस्पतालों, आपातकालीन चिकित्सा इकाइयों और सीमित संसाधनों वाले स्वास्थ्य संस्थानों में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है, जहाँ उन्नत जांच प्रणाली आसानी से उपलब्ध नहीं होती। शोधकर्ताओं का लक्ष्य है — हृदयाघात की पहचान को तेज़, सरल और बड़े पैमाने पर लागू करने योग्य बनाना।
इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल IEEE Sensors Letters में प्रकाशित किया गया है, जो इसके वैज्ञानिक प्रमाणिकता और वास्तविक उपयोग की क्षमता को रेखांकित करता है। यह पहल हृदय रोग निदान में भारत को वैश्विक स्वास्थ्य नवाचार की दिशा में अग्रणी बना सकती है।