हिम-कोनेक्ट के माध्यम से हिमालयी नवाचारों को मिलेगा वैश्विक मंच

हिम-कोनेक्ट के माध्यम से हिमालयी नवाचारों को मिलेगा वैश्विक मंच

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा ‘हिम-कोनेक्ट’ का आयोजन टेरी के वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट (डब्ल्यूएसडीएस) के अंतर्गत 25–27 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में किया जा रहा है। यह पहल भारतीय हिमालयी क्षेत्र (आईएचआर) में कार्यरत शोधकर्ताओं को स्टार्ट-अप्स, निवेशकों और नीति-निर्माताओं से जोड़ने का मंच प्रदान करेगी, ताकि शोध निष्कर्षों का व्यापक स्तर पर अनुप्रयोग संभव हो सके। यह कार्यक्रम 26 और 27 फरवरी को आम आगंतुकों के लिए खुला रहेगा।

हिम-कोनेक्ट में राष्ट्रीय हिमालय अध्ययन मिशन (एनएमएचएस) के अंतर्गत विकसित 24 से अधिक प्रौद्योगिकियों, प्रोटोटाइप, पेटेंट और पायलट परियोजनाओं का प्रदर्शन किया जाएगा।

शोध और उद्यम के बीच सेतु

एनएमएचएस के अंतर्गत कई स्थानीय और विज्ञान-आधारित समाधान विकसित किए गए हैं, परंतु उनके व्यावसायीकरण और क्रियान्वयन के लिए संरचित तंत्र की आवश्यकता रही है। हिम-कोनेक्ट इस अंतर को पाटने का प्रयास है।

यह मंच 100 से अधिक स्टार्ट-अप्स, इनक्यूबेटर, निवेशक और नीति-निर्माताओं को नवाचारकर्ताओं के साथ जोड़कर सहयोगात्मक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करेगा। इसका उद्देश्य वित्तीय सहायता, पायलट परियोजनाओं की तैनाती और उद्योग साझेदारी के माध्यम से तकनीकों का विस्तार सुनिश्चित करना है, विशेषकर नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों में।

प्रमुख संस्थान और नवाचार

कार्यक्रम में आईआईटी, सीएसआईआर प्रयोगशालाएं, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, एनआईटी, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एसकेयूएएसटी-के), कश्मीर विश्वविद्यालय, टेरी-गुवाहाटी, कुमाऊं विश्वविद्यालय और जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के नवाचार प्रदर्शित होंगे।

प्रमुख तकनीकों में पर्यावरण-अनुकूल सड़क निर्माण पद्धति, उपचारित अपशिष्ट जल से हाइड्रोपोनिक खेती, चीड़ की पत्तियों पर आधारित अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली, विकेन्द्रीकृत जल पुनः उपयोग मॉडल, कम लागत वाले खनिजीकृत जल शोधक, रेशम उत्पादन अपशिष्ट से निर्मित मरहम और याक दूध से कुटीर उद्योग आधारित पनीर प्रसंस्करण तकनीक शामिल हैं।

जलवायु लचीलापन और सतत विकास पर फोकस

एनएमएचएस द्वारा पिछले एक दशक में समर्थित 250 से अधिक क्रियाशील परियोजनाओं के अनुभव के आधार पर यह मंच जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन, नवीकरणीय ऊर्जा, अपशिष्ट से संपदा, सतत निर्माण और प्रकृति-आधारित आजीविका जैसे क्षेत्रों में फील्ड-प्रमाणित समाधान प्रस्तुत करेगा।

इन पहलों का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में हरित विकास को बढ़ावा देना और स्थानीय समुदायों की जलवायु लचीलापन क्षमता को सुदृढ़ करना है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • हिम-कोनेक्ट का आयोजन पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एनएमएचएस के अंतर्गत किया जा रहा है।
  • यह कार्यक्रम टेरी के वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट का हिस्सा है।
  • भारतीय हिमालयी क्षेत्र एशिया के लिए एक प्रमुख जलवायु नियंत्रक क्षेत्र है।
  • राष्ट्रीय हिमालय अध्ययन मिशन संरक्षण और सतत संसाधन प्रबंधन पर अनुसंधान को समर्थन देता है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र जैव विविधता, जल सुरक्षा और जलवायु संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र ऊपरी और निचले दोनों क्षेत्रों में लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। हिम-कोनेक्ट विज्ञान, वित्त और नीति को एकीकृत कर जलवायु अनुकूलन और हरित विकास को गति देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है, जो भारत को समाधान-उन्मुख जलवायु कार्रवाई और दक्षिण-दक्षिण सहयोग में अग्रणी भूमिका दिला सकती है।

Originally written on February 27, 2026 and last modified on February 27, 2026.

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