हिमालयी क्षेत्र में फलों की मक्खियों की दो नई प्रजातियों की खोज

हिमालयी क्षेत्र में फलों की मक्खियों की दो नई प्रजातियों की खोज

हिमाचल प्रदेश के सोलन क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने फलों की मक्खियों की दो नई प्रजातियों की खोज की है और एक ऐसे कीट समूह का भी दस्तावेजीकरण किया है जिसे भारत में पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था। यह शोध कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री के वैज्ञानिक मनीष पाल सिंह और ब्रिटेन के शोधकर्ता डेविड लॉरेंस हैनकॉक द्वारा किया गया। इस अध्ययन ने ट्राइपेटीनी (Trypetinae) उपपरिवार से संबंधित फलों की मक्खियों के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान को और विस्तारित किया है तथा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की समृद्ध लेकिन कम खोजी गई जैव विविधता को उजागर किया है।

हिमाचल प्रदेश में अनुसंधान अभियान

यह खोज हिमाचल प्रदेश के सोलन क्षेत्र में किए गए क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान हुई। वैज्ञानिकों ने कीटों को पकड़ने और अध्ययन करने के लिए पारंपरिक स्वीप नेट के साथ एक विशेष आकर्षक पदार्थ “सोलन बेट” का उपयोग किया। यह एक पेटेंट तकनीक है जो उन फलों की मक्खियों को आकर्षित करने में मदद करती है जिन्हें प्राकृतिक वातावरण में देखना कठिन होता है। क्षेत्रीय अध्ययन के बाद प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी की सहायता से उनके पंखों के पैटर्न और सूक्ष्म प्रजनन संरचनाओं का विश्लेषण किया गया। इस विस्तृत जांच से यह पुष्टि हुई कि एकत्र किए गए कीट भारत में पहले कभी दर्ज नहीं की गई प्रजातियाँ हैं।

Acidoxantha paratotoflava की पहचान

पहली नई प्रजाति का नाम “Acidoxantha paratotoflava” रखा गया है। यह मध्यम आकार की फल मक्खी है जिसका रंग हरा-पीला दिखाई देता है। इसके वक्ष भाग पर चार स्पष्ट काली धारियाँ और पेट पर बड़े काले निशान पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इसके नर प्रजनन अंगों में विशेष हुक जैसी संरचना भी पाई, जिसने इसे अलग प्रजाति के रूप में पहचानने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रजाति का नाम एक अन्य प्रजाति “Acidoxantha totoflava” से समानता के कारण रखा गया है, जिसे पहले भारत में गलत तरीके से पहचाना गया हो सकता है।

Hemilea suneriae की खोज

दूसरी नई प्रजाति “Hemilea suneriae” लाल-भूरे रंग की फल मक्खी है जिसके पूरे शरीर पर छोटे-छोटे काले धब्बे पाए जाते हैं। इसकी सबसे विशिष्ट पहचान इसके पंखों का अनोखा पैटर्न है, जिसमें गहरे रंग वाले हिस्से के भीतर एक पारदर्शी खिड़की जैसा भाग होता है जिसे “हायलिन इंडेंटेशन” कहा जाता है। आमतौर पर संबंधित प्रजातियों में ऐसे दो पारदर्शी पैच होते हैं, लेकिन इस प्रजाति में केवल एक ही पाया गया। इस प्रजाति का नाम शोधकर्ता की दिवंगत माता वर्मा सुनेरी के सम्मान में रखा गया है।

जैव विविधता और पारिस्थितिकी के लिए महत्व

इस शोध ने एक लंबे समय से चली आ रही वैज्ञानिक पहेली को भी सुलझाया। “Euphranta nigripeda” नामक प्रजाति का नर नमूना पहली बार दर्ज किया गया, जबकि इसे 1913 में केवल मादा नमूनों के आधार पर वर्णित किया गया था। इसके अलावा “Rhagoletis” नामक कीट वंश को भी पहली बार भारत में दर्ज किया गया है, जो वैश्विक स्तर पर फलों की फसलों को प्रभावित करने के लिए जाना जाता है। यह अध्ययन हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिक समृद्धि और वहाँ की विविध कीट प्रजातियों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • इस अध्ययन में वर्णित फल मक्खियाँ कीटों के ट्राइपेटीनी उपपरिवार से संबंधित हैं।
  • “Rhagoletis” वंश को पहली बार भारत में दर्ज किया गया है।
  • सिल्क कॉटन वृक्ष (Bombax ceiba) कुछ फल मक्खी प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण पोषक पौधा माना जाता है।
  • “Euphranta nigripeda” प्रजाति का वर्णन 1913 में किया गया था, लेकिन इसका नर नमूना हाल ही में पहचाना गया।

हिमालय के पाद क्षेत्रों में की गई यह खोज दर्शाती है कि इस क्षेत्र की जैव विविधता अभी भी पूरी तरह से खोजी नहीं गई है। ऐसे वैज्ञानिक अध्ययन न केवल नई प्रजातियों की पहचान करने में मदद करते हैं बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र, कीट-पौधा संबंधों और कृषि पर उनके प्रभाव को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

Originally written on March 9, 2026 and last modified on March 9, 2026.

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