स्वदेशी रक्षा तकनीक में भारत की बड़ी उपलब्धि: तेज गति वाली रॉकेट-स्लेज ईजेक्शन प्रणाली का सफल परीक्षण

स्वदेशी रक्षा तकनीक में भारत की बड़ी उपलब्धि: तेज गति वाली रॉकेट-स्लेज ईजेक्शन प्रणाली का सफल परीक्षण

भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। संगठन ने लड़ाकू विमानों के लिए विकसित उच्च गति वाली रॉकेट-स्लेज आधारित ईजेक्शन प्रणाली का सफल परीक्षण किया, जिससे आपातकालीन परिस्थितियों में पायलट की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में भारत ने महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

चंडीगढ़ में हुआ सफल उच्च गति परीक्षण

यह परीक्षण चंडीगढ़ स्थित DRDO की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेट्री (TBRL) के रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS) केंद्र में किया गया। परीक्षण के दौरान प्रणाली को 800 किलोमीटर प्रति घंटे की नियंत्रित गति पर परखा गया, जिससे वास्तविक उड़ान जैसी चरम परिस्थितियों का पुनर्निर्माण हुआ। इस दौरान एक डमी पायलट को सुरक्षित रूप से विमान संरचना से अलग होते देखा गया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि प्रणाली विश्वसनीय और प्रभावी है।

महत्वपूर्ण बचाव तंत्रों का प्रमाणीकरण

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस परीक्षण में आधुनिक ईजेक्शन प्रणाली के तीन प्रमुख घटकों कैनोपी विच्छेदन, सटीक ईजेक्शन क्रम और पूर्ण एयरक्रू रिकवरी की पुष्टि हुई। इन तंत्रों की सफलता यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में पायलट सुरक्षित रूप से विमान से बाहर निकल सके। यह तकनीक आधुनिक युद्धक विमानों के लिए अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर उच्च गति वाले अभियानों में।

सरकार और उद्योग जगत की सराहना

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO, भारतीय वायुसेना, एरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) तथा अन्य साझेदार संस्थानों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सफलता भारत की आत्मनिर्भरता के संकल्प को सशक्त बनाती है और स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को नई दिशा देती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • परीक्षण की गति: 800 किमी/घंटा
  • स्थान: टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेट्री, चंडीगढ़
  • प्रणाली: रेल ट्रैक रॉकेट स्लेज (RTRS)
  • मुख्य परीक्षण घटक: कैनोपी विच्छेदन, ईजेक्शन क्रम, एयरक्रू रिकवरी
  • संबद्ध संस्थान: DRDO, HAL, ADA, भारतीय वायुसेना

स्वदेशी रक्षा प्रगति की व्यापक पृष्ठभूमि

यह उपलब्धि भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के तहत एक और मजबूत कदम है। इससे पहले “ऑपरेशन सिंदूर” जैसे अभियानों में देश ने आकाश मिसाइल प्रणाली, ब्रह्मोस, एंटी-ड्रोन तकनीक, हवाई निगरानी प्रणालियाँ और उन्नत कमांड-एंड-कंट्रोल तंत्र जैसी स्वदेशी परियोजनाओं की सफलता प्रदर्शित की थी। DRDO के नेतृत्व ने यह स्पष्ट किया है कि भारत की रक्षा संस्थाएँ तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर गति से आगे बढ़ रही हैं।

Originally written on December 3, 2025 and last modified on December 3, 2025.

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