सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: सनातन संस्कृति के सहस्रवर्षीय संघर्ष और पुनर्निर्माण की गौरवगाथा
गुजरात के सोमनाथ मंदिर में 8 से 11 जनवरी तक “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” का आयोजन हो रहा है। यह चार दिवसीय उत्सव भारत की सनातन संस्कृति की अखंडता और आत्मबल को रेखांकित करने वाला एक राष्ट्रीय स्तर का सांस्कृतिक आयोजन है। केंद्रीय गृह मंत्री एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने देशवासियों से इस आयोजन में भाग लेने का आह्वान किया है।
आयोजन का उद्देश्य और राष्ट्रीय महत्व
अमित शाह ने बताया कि यह पर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय के अनुसार आयोजित किया गया है। इसका उद्देश्य:
- सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले दर्ज आक्रमण की 1000वीं वर्षगांठ का स्मरण
- भारतीय सभ्यता की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक निरंतरता का संप्रेषण
- आने वाली पीढ़ियों को भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और आत्मविश्वास से जोड़ना
यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत स्मृति और आत्मगौरव का सार्वजनिक पुनर्संस्कार है।
सोमनाथ मंदिर: एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक
अमित शाह ने सोमनाथ मंदिर को भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बताया और कहा कि यह मंदिर:
- सदियों तक हुए आक्रमणों के बावजूद बार-बार पुनर्निर्मित हुआ
- भारतीय सभ्यता की अडिग आस्था और पुनर्निर्माण की क्षमता का प्रतीक है
- इसका अस्तित्व सनातन संस्कृति की अमरता और संकल्प शक्ति को दर्शाता है
मंदिर का इतिहास दर्शाता है कि कैसे भारतीय सभ्यता विनाश के बाद भी पुनर्जीवित होकर खड़ी होती रही है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सोमनाथ मंदिर गुजरात के गिर सोमनाथ ज़िले में स्थित है।
- यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
- इस पर पहला दर्ज आक्रमण लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ था।
- यह मंदिर कई बार नष्ट और पुनः निर्मित हुआ है, जिससे इसकी सभ्यतागत दृढ़ता सिद्ध होती है।
सनातन संस्कृति का संदेश और जनभागीदारी
अमित शाह, जो सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के न्यासी भी हैं, ने कहा कि यह पर्व:
- सनातन संस्कृति की पुनर्जनन क्षमता को उजागर करता है
- आध्यात्मिक विरासत और सांस्कृतिक आत्मविश्वास की सामूहिक पुनर्पुष्टि है
- नागरिकों को भारत के आध्यात्मिक गौरव से जोड़ने का प्रयास है
उन्होंने सभी नागरिकों से इस पर्व में सक्रिय भागीदारी का आग्रह किया है, जिससे यह आयोजन राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का उत्सव बन सके।
“सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” केवल इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि यह उस जिजीविषा और विश्वास का उत्सव है जो भारत की आत्मा को अनंत काल से जीवन देता आ रहा है।