सुवाव नदी को पुनः ‘नदी’ का दर्जा देने का एनजीटी का ऐतिहासिक आदेश
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में बहने वाली सुवाव नदी को लेकर एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय निर्णय सामने आया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सुवाव की आधिकारिक राजस्व अभिलेखों और राजपत्र अधिसूचनाओं में की गई ‘नाला’ के रूप में वर्गीकृत प्रविष्टि को हटाकर उसे पुनः ‘नदी’ के रूप में दर्ज किया जाए। यह आदेश पर्यावरण संरक्षण और नदी पुनर्जीवन की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
आधिकारिक अभिलेखों में सुधार का निर्देश
एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने बलरामपुर के जिलाधिकारी को तीन माह के भीतर राजस्व अभिलेखों में आवश्यक संशोधन करने और इसे आधिकारिक राजपत्र तथा स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का निर्देश दिया। साथ ही बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के जिला प्रशासन को बाढ़ क्षेत्र (फ्लड प्लेन जोन) में नए निर्माण कार्यों पर रोक लगाने को कहा गया है, जब तक कि सक्रिय बाढ़ क्षेत्र का वैज्ञानिक निर्धारण और सीमांकन नहीं हो जाता।
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि आदेश की अवहेलना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 26 के तहत दंडनीय होगी। यह मामला स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) के आधार पर दर्ज किया गया था, जो न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है।
ऐतिहासिक और पारिस्थितिक महत्व
सुवाव नदी, जो लगभग 120 किलोमीटर लंबी है, राप्ती नदी की एक प्रमुख सहायक धारा है। ऐतिहासिक अभिलेखों में इसे ‘सुवावन’ नाम से उल्लेखित किया गया है और इसे क्षेत्र की महत्वपूर्ण जलधारा बताया गया है। यह नदी विभिन्न आर्द्रभूमियों, तालाबों और झीलों को पुनर्भरण करती हुई अंततः राप्ती में मिलती है, जो स्वयं गंगा नदी प्रणाली की सहायक है।
समय के साथ अतिक्रमण, भूमि पुनरुद्धार और विकास परियोजनाओं के कारण इसे ‘नाला’ घोषित कर दिया गया, जिससे इसके प्राकृतिक स्वरूप और पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि नदी तल पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और सामुदायिक भवन का निर्माण पर्यावरणीय क्षति और बाढ़ जोखिम को बढ़ा सकता है।
बाढ़ क्षेत्र संरक्षण और निगरानी व्यवस्था
एनजीटी ने जिला गंगा समितियों को सामुदायिक भागीदारी पर आधारित ‘संत सींचेवाल मॉडल’ को अपनाने का निर्देश दिया है, जिससे नदी पुनर्जीवन में स्थानीय समुदायों की भूमिका सुनिश्चित हो सके। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी, उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के परीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग को केंद्रीय जल आयोग के दिशा-निर्देशों और गंगा संरक्षण संबंधी प्रावधानों के अनुरूप छह माह के भीतर सक्रिय बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन करने को कहा गया है। यह कदम भविष्य में अतिक्रमण और अवैध निर्माण को रोकने में सहायक होगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना वर्ष 2010 में पर्यावरण संरक्षण और त्वरित न्याय के उद्देश्य से की गई थी।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 26 के तहत आदेश की अवहेलना पर दंड और कारावास का प्रावधान है।
- राप्ती नदी गंगा नदी प्रणाली की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
- बाढ़ क्षेत्र निर्धारण के लिए केंद्रीय जल आयोग द्वारा मानक दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं।
सुवाव नदी को पुनः ‘नदी’ का दर्जा देने का यह निर्णय केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और सतत विकास की दिशा में एक सशक्त संदेश है। इससे न केवल नदी की पारिस्थितिकी की रक्षा होगी, बल्कि बाढ़ प्रबंधन और स्थानीय जल संसाधनों के संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। यह आदेश दर्शाता है कि न्यायपालिका पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के प्रति गंभीर है और किसी भी प्रकार की लापरवाही पर सख्त रुख अपनाने को तैयार है।