सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पूर्व सैनिकों को पूर्ण विकलांगता पेंशन बकाया का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने हजारों पूर्व सैनिकों को बड़ी राहत देते हुए निर्णय दिया है कि पात्र सशस्त्र बल कर्मियों को विकलांगता पेंशन का पूरा बकाया 1 जनवरी 1996 या 1 जनवरी 2006 से, जैसा भी लागू हो, बिना तीन वर्ष की सीमा के भुगतान किया जाएगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विकलांगता पेंशन कोई दान नहीं, बल्कि राष्ट्र की सेवा में किए गए त्याग की कानूनी मान्यता है। एक बार पेंशन का अधिकार स्थापित हो जाने पर उसका लाभ उसी तिथि से दिया जाना चाहिए, जब वह देय हुआ था।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने केंद्र सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए पूर्व सैनिकों की अपीलों को स्वीकार किया। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या सशस्त्र बल अधिकरण के समक्ष दायर दावों के लिए बकाया राशि को केवल तीन वर्ष की अवधि तक सीमित किया जा सकता है।
केंद्र ने तर्क दिया कि ऐसे दावे सीमा अधिनियम, 1963 के अंतर्गत आते हैं और ‘निरंतर त्रुटि’ के सिद्धांत के बावजूद निर्धारित समयसीमा से आगे नहीं बढ़ाए जा सकते। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि विकलांगता पेंशन एक निहित अधिकार है, जिसे केवल प्रक्रियात्मक सीमाओं के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने पेंशन को “विलंबित प्रतिफल” बताया और इसे संविधान के अनुच्छेद 300ए के तहत संरक्षित संपत्ति का मूल्यवान अधिकार माना। निर्णय में कहा गया कि केवल इस आधार पर कि दावा देर से दायर किया गया, बकाया राशि को सीमित नहीं किया जा सकता।
यह विवाद 2014 के ऐतिहासिक ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम अवतार’ मामले से जुड़ा है, जिसमें तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने ‘ब्रॉड बैंडिंग’ का लाभ उन सैनिकों को भी देने का निर्देश दिया था, जो सेवा-सम्बंधित विकलांगता के साथ सेवानिवृत्त हुए थे, भले ही उन्हें सेवा से अयोग्य घोषित कर अलग न किया गया हो। ब्रॉड बैंडिंग के तहत विकलांगता प्रतिशत के आधार पर पेंशन राशि को उच्च स्तर पर समायोजित किया जाता है।
यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि पात्र पूर्व सैनिकों को उनका संपूर्ण वित्तीय अधिकार बिना मनमानी सीमा के प्राप्त हो। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि सैन्य सेवा की प्रकृति विशिष्ट है और सैनिकों के लिए कल्याणकारी उपाय कार्यपालिका की कृपा नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं।
इस फैसले से न केवल आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि यह सैनिकों के सम्मान और अधिकारों की न्यायिक मान्यता को भी सुदृढ़ करेगा।
- संविधान का अनुच्छेद 300ए संपत्ति के अधिकार की रक्षा करता है।
- सशस्त्र बल अधिकरण सशस्त्र बल कर्मियों के सेवा संबंधी विवादों का निपटारा करता है।
- सीमा अधिनियम, 1963 कानूनी दावों के लिए समयसीमा निर्धारित करता है।
- ‘ब्रॉड बैंडिंग’ विकलांगता की डिग्री के आधार पर पेंशन प्रतिशत को बढ़ाने की व्यवस्था है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पूर्व सैनिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्र की सेवा में हुए त्याग का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि विधिक और वित्तीय मान्यता के माध्यम से होना चाहिए।