सिंधु जल संधि स्थगन के बाद जम्मू-कश्मीर में नई जल प्रबंधन रणनीति

सिंधु जल संधि स्थगन के बाद जम्मू-कश्मीर में नई जल प्रबंधन रणनीति

जम्मू-कश्मीर सरकार ने सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के बाद नई जल प्रबंधन पहलों पर विचार शुरू किया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार के समक्ष रावी नदी के अतिरिक्त जल को जम्मू क्षेत्र की ओर मोड़ने तथा लंबे समय से लंबित तुलबुल नेविगेशन बैराज परियोजना को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा है। वर्ष 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद केंद्र ने 1960 की संधि को स्थगित कर दिया, जिससे केंद्र शासित प्रदेश में नई जल-नीति योजना के लिए मार्ग प्रशस्त हुआ।

तुलबुल नेविगेशन परियोजना का पुनरुद्धार

तुलबुल नेविगेशन बैराज परियोजना वुलर झील पर वर्ष 1984 में प्रारंभ की गई थी, लेकिन 1987 में पाकिस्तान की आपत्तियों के बाद इसे रोक दिया गया। इस परियोजना का उद्देश्य झील में न्यूनतम जल-स्तर बनाए रखते हुए वर्षभर नौवहन सुनिश्चित करना था।

अब संधि के स्थगन के बाद सरकार ने वुलर झील में पर्याप्त जल स्तर बनाए रखने का प्रस्ताव रखा है, जिससे नौवहन सुविधा बहाल हो सके, पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित किया जा सके तथा आसपास की कृषि भूमि को लाभ मिल सके। अधिकारियों का मानना है कि यह परियोजना कश्मीर घाटी को पारिस्थितिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से लाभान्वित कर सकती है।

रावी जल का सूखाग्रस्त जिलों की ओर मोड़

सरकार ने पंजाब में बहने वाली रावी नदी के अतिरिक्त जल को जम्मू के कठुआ और सांबा जिलों की बंजर भूमि की सिंचाई के लिए मोड़ने का भी प्रस्ताव रखा है। यह पहल शाहपुर कंडी बांध के लगभग पूर्ण होने से जुड़ी है, जिससे जल प्रवाह को नियंत्रित कर अतिरिक्त पानी के पाकिस्तान में जाने को रोका जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त, अखनूर क्षेत्र में चिनाब नदी से जल उठाने की एक बड़ी पंपिंग परियोजना का प्रस्ताव भी रखा गया है, ताकि जम्मू की दीर्घकालिक जल आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। अधिकारियों के अनुसार रावी जल का मोड़ सूखा-प्रवण क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता का विषय है।

सिंधु जल संधि का ढांचा

सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से संपन्न हुई थी। इसके तहत तीन पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत को आवंटित की गईं, जबकि तीन पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम और चिनाब—मुख्यतः पाकिस्तान को दी गईं। भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित उपयोग के अधिकार प्राप्त थे, किंतु भंडारण और मोड़ परियोजनाएं संधि की शर्तों के अधीन थीं। यह संधि कई युद्धों और तनावों के बावजूद दशकों तक कायम रही, इसलिए इसका स्थगन एक महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटना माना जा रहा है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

* सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए थे।
* पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास और सतलुज—भारत को आवंटित हैं।
* पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम और चिनाब—मुख्यतः पाकिस्तान के उपयोग के लिए निर्धारित हैं।
* वुलर झील भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक है और यह जम्मू-कश्मीर में स्थित है।

इन प्रस्तावित पहलों से स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर सरकार पूर्वी नदियों के जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने और रुकी हुई परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यदि ये योजनाएं क्रियान्वित होती हैं, तो इससे सिंचाई, नौवहन और जल सुरक्षा को मजबूती मिलेगी तथा क्षेत्रीय जल समीकरणों पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

Originally written on February 18, 2026 and last modified on February 18, 2026.

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