सामुदायिक वन प्रबंधन में केंद्र सरकार की नई पहल

सामुदायिक वन प्रबंधन में केंद्र सरकार की नई पहल

वर्तमान समय में भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन को सशक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है। विशेष रूप से उन ग्राम सभाओं और समुदायों के लिये, जिन्हें वनों पर पारंपरिक संरक्षण और प्रबंधन के अधिकार प्राप्त हैं, सरकार अब वित्तीय सहायता प्रदान करने की दिशा में गंभीर रूप से विचार कर रही है। यह पहल मुख्य रूप से वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) के तहत स्थापित कम्युनिटी फ़ॉरेस्ट रिसोर्स (CFR) प्रबंधन समितियों को मजबूत करने के उद्देश्य से है।

भारत सरकार के केंद्र और संबंधित राज्य मंत्रालयों — विशेषकर जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय — के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हाल ही में प्रस्तावित वित्तीय सहायता पर चर्चा हुई है। इस चर्चा का मुख्य लक्ष्य उन ग्राम सभाओं को तकनीकी और वित्तीय समर्थन देना है जिनके पास वन प्रबंधन के अधिकार हैं। ग्राम सभा–नेतृत्व वाले वन प्रबंधन को बढ़ावा देने की कोशिश इस धारणा को बदलने के लिये है कि वन विभाग सिर्फ वन ब्यूरोक्रेसी तक सीमित रहना चाहता है और समुदायों के नेतृत्व वाली संरक्षण पहलों के प्रति पक्षपाती है।

सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि वन अधिकार संरचना के अन्तर्गत सामुदायिक अधिकारों को सम्मानजनक रूप से मान्यता मिले और ग्राम सभाएँ सक्रिय रूप से वन संरक्षण की प्रक्रिया में भाग ले सकें। इसी कारण से जनजातीय कार्य मंत्रालय निकट भविष्य में पर्यावरण मंत्रालय को औपचारिक तौर पर वित्तीय सहायता के लिये पत्र भेजने की योजना पर भी काम कर रहा है

वन अधिकार अधिनियम, जिसे 2006 में लागू किया गया था, का मूल उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को उनके ऐतिहासिक वन भूमि और संसाधनों पर अधिकार प्रदान करना है। इस अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं को उन वन क्षेत्रों पर कम्युनिटी फ़ॉरेस्ट रिसोर्स (CFR) अधिकार प्राप्त होते हैं जिनको उन्होंने पारंपरिक तौर पर संरक्षण, पुनरुत्थान और संधारण के लिये प्रबंधित किया है।

CFR अधिकार कानूनी रूप से ग्राम सभा को FRA टाइटल जारी करके प्रदान किये जाते हैं। इसके साथ ही समुदायों को अधिकार मिलता है कि वे इन वन क्षेत्रों के स्थायी उपयोग, संरक्षण और प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाएं।

2023 में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ऐसे विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये जिनका उद्देश्य उन्हीं वन क्षेत्रों का प्रबंधन करना था जहाँ CFR अधिकार पहले ही प्रदान किये जा चुके हैं। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार:

  • CFR प्रबंधन समितियाँ ग्राम सभाओं के नेतृत्व में गठित की जानी हैं।
  • समुदायों को अपनी संरक्षण और प्रबंधन योजनाएँ स्वयं तैयार करनी होती हैं।
  • इन योजनाओं को वन विभाग के वर्किंग प्लान से समन्वित करना आवश्यक है।
  • योजनाओं में स्थानीय संसाधनों के सतत उपयोग, जैव विविधता संरक्षण और ग्रामीण समुदाय की भागीदारी को प्राथमिकता दी जाती है।

इन व्यवस्थाओं से न केवल समुदायों की भागीदारी बढ़ती है बल्कि वन संरक्षण का एक संतुलित तथा न्यायसंगत ढांचा भी स्थापित होता है।

अधिकारियों के अनुसार, CFR प्रबंधन समितियों को प्रभावी संचालन के लिये निरंतर वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। इन निधियों का उपयोग मुख्यतः निम्नलिखित कार्यों के लिये किया जाता है:

  • स्टाफ की नियुक्ति और प्रशिक्षण।
  • वन प्रबंधन योजनाओं की तैयारी और कार्यान्वयन।
  • समुदाय के सदस्यों को वन प्रबंधन के रोज़मर्रा के कार्यों का प्रशिक्षण देना।
  • संरक्षण गतिविधियों के लिये आवश्यक उपकरण और संसाधन उपलब्ध कराना।

केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि वित्तीय सहायता वन विभाग के पूर्ण नियंत्रण में न चले बल्कि यह ग्राम सभा के नेतृत्व वाली संरचनाओं के माध्यम से प्रवाहित हो और समुदाय के निर्णय व नियंत्रण को संरक्षित रखे। इसी उद्देश्य से वित्तीय सहायता की व्यवस्था और उसके निगमन के लिये सुरक्षा उपाय विकसित किये जा रहे हैं।

  • वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 में पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देने के लिये लागू किया गया।
  • CFR अधिकार ग्राम सभाओं को उन वन क्षेत्रों पर मिलते हैं जिन्हें उन्होंने संरक्षण व प्रबंधन के लिये इस्तेमाल किया।
  • 2023 में CFR प्रबंधन समितियों के लिये विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये गये।
  • वर्तमान में वित्तीय सहायता के लिये पर्यावरण मंत्रालय के साथ औपचारिक चर्चा जारी है।

समग्र रूप से यह पहल भारत में सामुदायिक वन प्रबंधन के लिये एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे पारंपरिक वनवासियों की भागीदारी भी मजबूत होगी तथा सतत वन संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।

Originally written on January 13, 2026 and last modified on January 13, 2026.

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