सम्राट सम्प्रति: जैन धर्म के महान संरक्षक
हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री द्वारा गुजरात में सम्राट सम्प्रति संग्रहालय का उद्घाटन किया गया, जिससे इस महान लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित मौर्य शासक की विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया है। यह पहल भारत के प्राचीन इतिहास और विशेष रूप से जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में सम्राट सम्प्रति के योगदान को उजागर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सम्राट सम्प्रति का परिचय
सम्राट सम्प्रति का शासनकाल लगभग 224 से 215 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है। वे महान मौर्य सम्राट अशोक के पोते थे और उन्हें इन्द्रपालित, संगत तथा विगताशोक जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता था। उनका शासन जैन धर्म के प्रचार और अहिंसा के सिद्धांत को बढ़ावा देने के लिए प्रसिद्ध है, जिसके कारण उन्हें ‘जैन अशोक’ की उपाधि दी गई।
जैन धर्म के प्रसार में योगदान
सम्राट सम्प्रति ने जैन धर्म के विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐतिहासिक और धार्मिक स्रोतों के अनुसार, उन्होंने जैन धर्म को भारत से बाहर भी फैलाने का प्रयास किया और ईरान तथा अरब क्षेत्रों में इसके केंद्र स्थापित किए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पश्चिमी और दक्षिणी भारत में हजारों जैन मंदिरों का निर्माण कराया, जिससे जैन धर्म की संस्थागत संरचना मजबूत हुई।
ऐतिहासिक स्रोत और विवरण
सम्राट सम्प्रति के जीवन और कार्यों का उल्लेख विभिन्न जैन ग्रंथों में मिलता है, जैसे ‘सम्प्रतिकथा’, ‘परिशिष्टपर्व’ और ‘प्रभावकचरित’। ये ग्रंथ उनके शासन, धार्मिक झुकाव और मिशनरी गतिविधियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। इन स्रोतों के अनुसार, वे एक ऐसे शासक थे जो नैतिकता, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति अत्यंत समर्पित थे।
जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत
जैन धर्म एक श्रमण परंपरा से संबंधित धर्म है, जिसमें तपस्या और आत्मसंयम को विशेष महत्व दिया जाता है। इस धर्म में 24 तीर्थंकर माने जाते हैं, जिनमें वर्धमान महावीर अंतिम तीर्थंकर थे। जैन धर्म का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है, जो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के माध्यम से संभव होता है। इसके नैतिक आधार पंचमहाव्रत हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य, जो अनुयायियों को अनुशासित और अहिंसक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सम्राट सम्प्रति मौर्य वंश के शासक और अशोक के पोते थे।
- उन्हें जैन धर्म के प्रचार के लिए ‘जैन अशोक’ कहा जाता है।
- जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर थे।
- पंचमहाव्रत में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य शामिल हैं।
अंततः, सम्राट सम्प्रति भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने जैन धर्म और अहिंसा के सिद्धांतों को व्यापक स्तर पर फैलाया। उनके योगदान को याद करना न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि वर्तमान समय में नैतिक मूल्यों को समझने के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।