सबरीमाला में मकर विलक्कु उत्सव की तैयारियाँ जोरों पर, भक्तों का सैलाब उमड़ा
केरल स्थित पहाड़ी तीर्थस्थल सबरीमाला मंदिर में मकर विलक्कु उत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं। यह पवित्र आयोजन इस वर्ष 14 जनवरी को मकर संक्रांति की रात मनाया जाएगा, जिसे सबरीमाला तीर्थयात्रा के वार्षिक समापन का आध्यात्मिक शिखर माना जाता है। हज़ारों श्रद्धालु पहले ही क्षेत्र में पहुँच चुके हैं ताकि पोंनंबलमेडु की पहाड़ियों पर प्रकट होने वाले दिव्य “मकरज्योति” के दर्शन कर सकें।
अनुष्ठान और तीर्थयात्रियों की व्यवस्थाएँ
मकर विलक्कु उत्सव के प्रमुख अनुष्ठानों में भगवान अयप्पा के पवित्र आभूषणों – “थिरुवाभरणम” – की शोभायात्रा विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। यह शोभायात्रा पारंपरिक रूप से अरनमुला से सबरीमाला तक जाती है और रास्ते में भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। तीर्थयात्री पंपा और अन्य पास के क्षेत्रों में डेरा डाल चुके हैं। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की भीड़ को सँभालने हेतु विस्तृत इंतज़ाम किए हैं।
सुरक्षा प्रबंध और भीड़ नियंत्रण
सन्निधानम क्षेत्र और मकरज्योति के दर्शन बिंदुओं पर सुरक्षा को काफी बढ़ा दिया गया है। तीर्थयात्रा के दौरान किसी भी प्रकार की अफरा-तफरी को रोकने के लिए विशेष नियम लागू किए गए हैं। मकर संक्रांति की रात को संभावित भीड़ को देखते हुए “वर्चुअल कतार प्रणाली” के माध्यम से सिर्फ 30,000 श्रद्धालुओं को प्रवेश की अनुमति दी गई है, जो नियंत्रित व्यवस्था की ओर प्रशासन के गंभीर दृष्टिकोण को दर्शाता है।
मकर विलक्कु का आध्यात्मिक महत्व
मकर विलक्कु, जिसे मकरज्योति भी कहा जाता है, भगवान अयप्पा के भक्तों के लिए अत्यंत आध्यात्मिक महत्व रखता है। मान्यता है कि पोंनंबलमेडु की पहाड़ी पर दिखाई देने वाली दिव्य ज्योति भगवान अयप्पा की उपस्थिति और आशीर्वाद का प्रतीक है। यह उत्सव सूर्य के मकर राशि में प्रवेश (मकर संक्रांति) के साथ जुड़ा है और आत्मिक नवीकरण, अनुशासन तथा समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मकर विलक्कु उत्सव सबरीमाला तीर्थयात्रा से जुड़ा हुआ है।
- मकरज्योति का दर्शन पोंनंबलमेडु पहाड़ियों पर मकर संक्रांति की रात होता है।
- थिरुवाभरणम भगवान अयप्पा के पवित्र आभूषणों को कहा जाता है।
- श्रद्धालु दर्शन से पहले पारंपरिक 41 दिन का व्रत (व्रतम) पालन करते हैं।
भक्ति, अनुशासन और परंपरा का चरम बिंदु
मकर विलक्कु सबरीमाला तीर्थ की भक्ति यात्रा का सर्वोच्च बिंदु है, जो मंडल पूजा की साप्ताहिक साधना के बाद आता है। श्रद्धालु 41 दिनों तक ब्रह्मचर्य, संयम, सादगी और “स्वामीए शरणम् अयप्पा” के जाप के साथ इस यात्रा में भाग लेते हैं। जैसे ही पोंनंबलमेडु की पहाड़ी पर दिव्य ज्योति प्रकट होती है, वह क्षण लाखों श्रद्धालुओं की आस्था और सबरीमाला की आध्यात्मिक विरासत को पुनः जीवंत करता है।
यह उत्सव न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और आस्था की ताकत का प्रतीक भी है।