श्वेत-वक्ष समुद्री गरुड़ के घोंसलों में बढ़ोतरी: उत्तर केरल में संरक्षण की नई उम्मीद
उत्तर केरल के कन्नूर और कासरगोड जिलों में इस वर्ष श्वेत-वक्ष समुद्री गरुड़ के घोंसलों की वार्षिक निगरानी में सकारात्मक संकेत मिले हैं। इस मौसम में कुल 17 सक्रिय घोंसले दर्ज किए गए, जो वर्ष 2024 में दर्ज 13 घोंसलों की तुलना में मामूली वृद्धि दर्शाते हैं। यह सर्वेक्षण वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं और सामाजिक वानिकी प्रभागों के संयुक्त प्रयास से संपन्न हुआ। हालांकि वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन ऐतिहासिक आंकड़ों की तुलना में स्थिति अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं मानी जा रही।
जिला-वार घोंसलों का वितरण
कुल 17 सक्रिय घोंसलों में से 10 कासरगोड जिले में और सात कन्नूर जिले में पाए गए। कासरगोड में सभी घोंसले पुराने श्रेणी के हैं, जबकि कन्नूर में चार नए और तीन पुराने घोंसले दर्ज किए गए।
विशेष रूप से कासरगोड में लगभग 70 प्रतिशत घोंसले मंदिर परिसरों के भीतर पाए गए, जो यह दर्शाता है कि धार्मिक स्थलों में सुरक्षित और संरक्षित वृक्ष इन पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। दूसरी ओर, कन्नूर में घोंसले सार्वजनिक भूमि, निजी संपत्तियों और तटीय क्षेत्रों में फैले हुए मिले। पहली बार कट्टमपल्ली क्षेत्र में एक टेलीफोन टॉवर पर भी घोंसला दर्ज किया गया, जो इस प्रजाति की बदलते परिवेश के प्रति अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।
आवासीय प्राथमिकताएँ और वृक्ष प्रजातियाँ
सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ कि यह प्रजाति बड़े और परिपक्व वृक्षों को प्राथमिकता देती है। पीपल के वृक्ष पर चार, आम के वृक्ष पर छह, सप्तपर्णी पर दो और कैसुअरीना प्रजातियों पर तीन घोंसले पाए गए। इससे यह संकेत मिलता है कि ऊँचे और मजबूत वृक्ष इनके प्रजनन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
तटीय और आबादी वाले क्षेत्रों में ऐसे वृक्षों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक घोंसले मंदिर परिसरों और मानव बस्तियों के भीतर पाए जाने से यह भी सिद्ध होता है कि यदि घोंसले वाले वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और व्यवधान कम रखा जाए, तो यह पक्षी मनुष्यों के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है।
संरक्षण संबंधी चुनौतियाँ और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
हालांकि वर्तमान में घोंसलों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन वर्ष 1996 में क्षेत्र में 25 सक्रिय घोंसलों का रिकॉर्ड था। इससे स्पष्ट है कि जनसंख्या अभी भी अपने पुराने स्तर तक नहीं पहुँच सकी है। श्वेत-वक्ष समुद्री गरुड़ जनवरी से मार्च के बीच प्रजनन करता है और सामान्यतः हर वर्ष उसी घोंसले का पुनः उपयोग करता है, जिसे प्रजनन काल से पहले मरम्मत किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बड़े घोंसले वाले वृक्षों की कटाई इस प्रजाति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि ऐसे वृक्ष नष्ट होते रहे, तो घोंसलों की संख्या में पुनः गिरावट आ सकती है।
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु
श्वेत-वक्ष समुद्री गरुड़ तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का शीर्ष शिकारी है।
इसे समुद्री और तटीय पर्यावरणीय स्वास्थ्य का सूचक प्रजाति माना जाता है।
केरल में यह केवल कन्नूर और कासरगोड जिलों में घोंसले बनाता है।
यह जनवरी से मार्च के बीच प्रजनन करता है और घोंसलों का वार्षिक पुनः उपयोग करता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
समुद्री गरुड़ प्रजातियाँ सामान्यतः जलाशयों, नदियों और तटीय क्षेत्रों के समीप निवास करती हैं।
बड़े और ऊँचे वृक्ष इनके घोंसले निर्माण के लिए अनिवार्य होते हैं।
घोंसलों की निगरानी से जैव विविधता संरक्षण की स्थिति का आकलन किया जाता है।
सार्वजनिक सहभागिता वन्यजीव संरक्षण अभियानों की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
समग्र रूप से देखा जाए तो घोंसलों की बढ़ती संख्या आशा की किरण अवश्य प्रदान करती है, परंतु दीर्घकालिक संरक्षण के लिए निरंतर निगरानी, वृक्ष संरक्षण और जनसहभागिता आवश्यक है। यदि स्थानीय समुदाय, वन विभाग और संरक्षण संस्थाएँ मिलकर प्रयास करें, तो उत्तर केरल में इस गौरवशाली पक्षी की सुरक्षित उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकती है।