शेट्टीहल्ली वन्यजीव अभयारण्य की सीमा घटाने के प्रस्ताव पर विवाद, मंत्री का दौरा और कानूनी बहस

शेट्टीहल्ली वन्यजीव अभयारण्य की सीमा घटाने के प्रस्ताव पर विवाद, मंत्री का दौरा और कानूनी बहस

कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में स्थित शेट्टीहल्ली वन्यजीव अभयारण्य की अधिसूचित सीमा को घटाने के प्रस्ताव को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में राज्य के वन मंत्री श्री ईश्वर खांडरे ने अभयारण्य का दौरा कर जमीनी स्थिति का जायजा लिया। यह मुद्दा अब संरक्षणवादियों, राज्य सरकार और कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहस का विषय बन चुका है।

सरकार की तर्क-व्यवस्था और “बाउंडरी रेशनलाइजेशन” का उद्देश्य

वन मंत्री ने मीडिया को बताया कि वन विभाग 2016 से ही शेट्टीहल्ली अभयारण्य की सीमा को सुधारने का प्रयास कर रहा है, क्योंकि वर्तमान अधिसूचित क्षेत्र में बस स्टेशन, शहरी भवन और अन्य नगरीय संरचनाएँ भी शामिल हो गई हैं। उनका कहना है कि अब तक दो समीक्षा बैठकें हो चुकी हैं और तीसरी बैठक में स्थानीय आजीविका और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

अधिसूचित क्षेत्र की वास्तविकता पर मतभेद

वन विभाग का दावा है कि शेट्टीहल्ली अभयारण्य का वास्तविक क्षेत्रफल लगभग 395 वर्ग किमी है, जबकि रिकॉर्ड में गलती से 695 वर्ग किमी दर्ज हो गया था। इसके विपरीत, संरक्षणवादियों का कहना है कि 1974 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम की धारा 18 के तहत अधिसूचित अभयारण्य का विवरण 700 वर्ग किमी से अधिक क्षेत्र को कवर करता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार, संख्यात्मक क्षेत्रफल नहीं बल्कि सीमा का वर्णन ही कानूनी रूप से मान्य होता है।

वन्यजीव बोर्ड की भूमिका और कानूनी जटिलताएँ

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने कर्नाटक सरकार के प्रस्ताव को सशर्त मंजूरी दी थी, जिसमें भद्र टाइगर रिज़र्व के बफर ज़ोन में दो वन क्षेत्रों को शामिल करना था। हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने सुझाव दिया कि ये क्षेत्र बफर ज़ोन में नहीं, बल्कि सीधे अभयारण्य में ही जोड़े जाएं। इसके बाद, राज्य वन्यजीव बोर्ड ने कानूनी पेचिदगियों का हवाला देते हुए प्रस्ताव पर निर्णय टाल दिया।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • शेट्टीहल्ली वन्यजीव अभयारण्य 1974 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 18 के तहत अधिसूचित किया गया था।
  • धारा 18 के अंतर्गत अभयारण्य की सीमा का वर्णन ही उसका कानूनी दायरा तय करता है।
  • राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड संरक्षित क्षेत्रों में बदलाव के लिए सलाह देता है, लेकिन अंतिम निर्णय राज्य सरकार और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन होता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी यह माना है कि क्षेत्र का वर्णन संख्या से अधिक कानूनी रूप से मान्य है।

संरक्षणवादियों की आपत्ति और न्यायिक दृष्टिकोण

संरक्षण समूहों ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट की सहायता कर रही केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) के समक्ष उठाया है। उनका तर्क है कि अधिसूचित वन क्षेत्र से लगभग 30,000 एकड़ भूमि को अतिक्रमण के आधार पर बाहर करना कानून के सिद्धांतों के विरुद्ध है। उन्होंने मंत्री को इन चिंताओं से अवगत कराया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस विवाद में पर्यावरण संरक्षण, कानूनी वैधता और विकास के बीच संतुलन बनाना बेहद जटिल चुनौती है।

शेट्टीहल्ली अभयारण्य की सीमा को लेकर यह विवाद केवल एक राज्यीय निर्णय नहीं है, बल्कि यह देश के वन्यजीव संरक्षण कानून और विकास की दिशा में हमारी प्रतिबद्धता की परीक्षा भी बन गया है।

Originally written on January 30, 2026 and last modified on January 30, 2026.

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