शरावती घाटी लायन-टेल्ड मकाक अभयारण्य में गतिविधियों पर कर्नाटक हाईकोर्ट की रोक
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने शरावती घाटी लायन-टेल्ड मकाक अभयारण्य और उसके आसपास के ईको-सेंसिटिव जोन में सभी जमीनी गतिविधियों पर अस्थायी रोक लगाने का निर्देश दिया है। यह आदेश उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया जिसमें शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना और कलकत्ते ब्रिज के निर्माण को चुनौती दी गई है। अदालत ने माना कि यह मामला गंभीर पर्यावरणीय चिंताओं से जुड़ा है और इसकी गहन न्यायिक जांच आवश्यक है।
अदालत का अंतरिम संरक्षण आदेश
मुख्य न्यायाधीश विभू बाखरू और न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश जारी किया। अदालत ने निर्देश दिया कि अभयारण्य और उसके ईको-सेंसिटिव क्षेत्र के भीतर परियोजना से जुड़ी किसी भी प्रकार की भौतिक या जमीनी गतिविधि नहीं की जाएगी। अदालत ने कहा कि जब तक मामले की अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक परियोजना से संबंधित सभी कार्य स्थगित रहेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 10 जून को निर्धारित की गई है।
परियोजना के खिलाफ दायर जनहित याचिका
यह जनहित याचिका वन्यजीव संरक्षणवादी अखिलेश चिपली, मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. रविंद्रनाथ शानभोग और पर्यावरणविद् मनोहर कुमार सी. बी. द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने 28 जनवरी 2025 को कर्नाटक राज्य वन्यजीव बोर्ड द्वारा 2000 मेगावाट की शरावती पंप्ड स्टोरेज परियोजना को दी गई स्वीकृति को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि अभयारण्य के भीतर ऐसी परियोजनाएँ पश्चिमी घाट के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
अदालत में प्रस्तुत तर्क
सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. अरविंद कामत ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार को भी इस परियोजना को लेकर गंभीर पर्यावरणीय चिंताएँ हैं और अभी तक आवश्यक वैधानिक मंजूरी नहीं दी गई है। वहीं कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि मामला अभी राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के विचाराधीन है और इसलिए याचिका समय से पहले दायर की गई हो सकती है। कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के वकील ने यह भी कहा कि कुछ गैर-वन गतिविधियाँ संभवतः अनुमति योग्य हो सकती हैं।
प्रस्तावित परियोजना से पर्यावरणीय चिंताएँ
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज परियोजना और पुल निर्माण से क्षेत्र की जैव विविधता को गंभीर खतरा हो सकता है। इस क्षेत्र में कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें लायन-टेल्ड मकाक प्रमुख है। उनका तर्क है कि ऐसी गतिविधियाँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत प्रदान किए गए संरक्षण प्रावधानों का उल्लंघन कर सकती हैं। अदालत ने भी इन पर्यावरणीय चिंताओं की गंभीरता को स्वीकार करते हुए फिलहाल सभी जमीनी कार्यों को रोकने का निर्णय लिया है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- लायन-टेल्ड मकाक एक संकटग्रस्त प्राइमेट प्रजाति है जो केवल पश्चिमी घाट क्षेत्र में पाई जाती है।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर गतिविधियों को नियंत्रित करता है।
- इस अधिनियम की धारा 29 अभयारण्यों के भीतर वन्यजीव आवास के विनाश या परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाती है।
- पश्चिमी घाट यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और इसे विश्व के प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट्स में शामिल किया जाता है।
इस प्रकार कर्नाटक उच्च न्यायालय का यह अंतरिम आदेश पर्यावरण संरक्षण और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को दर्शाता है। अंतिम निर्णय आने तक परियोजना से जुड़े सभी कार्यों पर रोक रहने से क्षेत्र की पारिस्थितिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।