विक्रम-1 रॉकेट: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की नई उड़ान
भारत का निजी अंतरिक्ष क्षेत्र एक महत्वपूर्ण उपलब्धि की ओर बढ़ रहा है। हैदराबाद स्थित स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस देश के पहले निजी रूप से विकसित कक्षीय रॉकेट विक्रम-1 के प्रक्षेपण की तैयारी कर रहा है। यह मिशन भारत के तेजी से विकसित हो रहे वाणिज्यिक अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है। वर्ष 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका द्वारा स्थापित स्काईरूट एयरोस्पेस का उद्देश्य छोटे उपग्रहों के लिए किफायती और लचीली प्रक्षेपण सेवाएं उपलब्ध कराना है।
विक्रम-1 रॉकेट और निजी अंतरिक्ष पहल
विक्रम-1 लगभग सात मंजिला ऊंचाई वाला रॉकेट है जिसकी ऊंचाई करीब 75 फीट है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह लगभग 300 किलोग्राम तक के उपग्रहों को कक्षा में स्थापित कर सके। यह रॉकेट स्काईरूट की विक्रम श्रृंखला का हिस्सा है और इसका नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।
इस रॉकेट में ऑल-कार्बन कंपोजिट संरचना और उन्नत प्रणोदन प्रणाली का उपयोग किया गया है। इसके तीन चरण—कलाम-1200, कलाम-250 और कलाम-125—ठोस ईंधन पर आधारित हैं। वहीं ऊपरी कक्षा समायोजन मॉड्यूल में रमन-2 नामक 3डी प्रिंटेड तरल इंजन का उपयोग किया गया है। रॉकेट के विभिन्न घटकों का एकीकरण और परीक्षण हैदराबाद स्थित मैक्स-क्यू मुख्यालय में किया जा रहा है। इसका पहला प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से होने की संभावना है।
छोटे उपग्रहों के लिए विशेष प्रक्षेपण सेवाएं
स्काईरूट एयरोस्पेस अंतरिक्ष प्रक्षेपण उद्योग के एक विशेष क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिसे छोटे उपग्रहों के लिए समर्पित प्रक्षेपण सेवाएं कहा जाता है। पारंपरिक बड़े प्रक्षेपण प्रदाताओं की तरह कई उपग्रहों को एक साथ भेजने के बजाय कंपनी का उद्देश्य प्रत्येक मिशन को विशेष रूप से अनुकूलित करना है।
इस मॉडल को कंपनी “स्पेस कैब” के रूप में वर्णित करती है, जिसका मतलब है कि ग्राहक अपने उपग्रह को इच्छित कक्षा में सटीक रूप से स्थापित करा सकते हैं। संचार, पृथ्वी अवलोकन और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए छोटे उपग्रहों की बढ़ती मांग के कारण ऐसी सेवाओं की आवश्यकता तेजी से बढ़ रही है।
उन्नत तकनीक और विनिर्माण क्षमता
स्काईरूट अपने रॉकेटों के निर्माण में कार्बन फाइबर संरचना और एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रही है। इन तकनीकों से रॉकेट हल्के, अधिक कुशल और कम लागत वाले बनते हैं।
हैदराबाद में स्थित कंपनी का इन्फिनिटी कैंपस भविष्य में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए विकसित किया गया है। इस सुविधा का लक्ष्य परिचालन के विस्तार के बाद हर महीने एक विक्रम-श्रेणी के रॉकेट का निर्माण करना है। कंपनी ने कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कंपनियों के साथ साझेदारी भी की है, जिससे उसके वाणिज्यिक प्रक्षेपण कार्यक्रम को विस्तार मिलने की उम्मीद है।
भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष लक्ष्यों की दिशा
स्काईरूट एयरोस्पेस का लक्ष्य अंतरिक्ष तक पहुंच को अधिक सस्ता और नियमित बनाना है। भविष्य में कंपनी बड़े और पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यानों के विकास की दिशा में भी काम कर सकती है। आने वाले समय में कुछ मिशन तमिलनाडु में प्रस्तावित कुलसेकरपट्टिनम अंतरिक्ष केंद्र जैसे निजी प्रक्षेपण स्थलों से भी संचालित हो सकते हैं।
अग्निकुल कॉसमॉस जैसी अन्य स्टार्टअप कंपनियों के साथ मिलकर स्काईरूट भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के नए युग का प्रतिनिधित्व कर रही है। इन कंपनियों के प्रयासों से भारत छोटे उपग्रह प्रक्षेपण के वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- स्काईरूट एयरोस्पेस ने नवंबर 2022 में भारत का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-एस लॉन्च किया था।
- विक्रम-1 रॉकेट लगभग 300 किलोग्राम तक के उपग्रहों को निम्न पृथ्वी कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है।
- रॉकेट के कक्षा समायोजन मॉड्यूल में रमन-2 नामक 3डी प्रिंटेड तरल इंजन का उपयोग किया गया है।
- भारत में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार को इन-स्पेस के माध्यम से निजी भागीदारी की अनुमति मिलने के बाद बढ़ावा मिला है।
विक्रम-1 का प्रक्षेपण भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक कदम हो सकता है। इससे न केवल भारत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन होगा, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में देश की भागीदारी भी मजबूत होगी।