वन संरक्षण नियमों में संशोधन: निजी वृक्षारोपण को छूट, पर्यावरणीय प्रभावों पर बहस
केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में किए गए वन संरक्षण नियमों में संशोधन ने एक बार फिर भारत के जंगलों में निजी क्षेत्र की भूमिका को लेकर बहस को जन्म दे दिया है। संशोधन का उद्देश्य वृक्षारोपण को बढ़ावा देना है, परंतु इससे पर्यावरणविदों और आदिवासी अधिकार संगठनों में चिंता की लहर है। अब सरकारी या निजी एजेंसियों द्वारा किए गए वृक्षारोपण को “वन संबंधी गतिविधियों” की श्रेणी में रखते हुए कई पर्यावरणीय दायित्वों से छूट दी गई है।
संशोधित नियमों की मुख्य बातें
वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 के अंतर्गत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने समेकित दिशा-निर्देशों में संशोधन किया है। इसके तहत अब सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन, वनीकरण एवं वृक्षारोपण जैसी गतिविधियों को “वन संबंधी कार्य” माना जाएगा, भले ही उन्हें सरकारी या गैर-सरकारी निकायों द्वारा किया गया हो।
इस बदलाव से ऐसे परियोजनाओं को अब “नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV)” और “प्रतिपूरक वनीकरण” जैसी शर्तों से छूट मिल जाएगी, जो अब तक किसी भी वन भूमि के व्यावसायिक उपयोग पर अनिवार्य थीं।
नेट प्रेजेंट वैल्यू और प्रतिपूरक वनीकरण क्या है?
- नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV): यह एक बार लिया जाने वाला शुल्क है, जो वन भूमि के व्यावसायिक उपयोग से जैव विविधता, जल संचयन और कार्बन अवशोषण जैसी पारिस्थितिक सेवाओं के नुकसान की भरपाई के लिए लिया जाता है।
- प्रतिपूरक वनीकरण: जब किसी वन भूमि का गैर-वन उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है, तब उसकी भरपाई के लिए अन्यत्र नए वन क्षेत्र का निर्माण करना होता है।
नए नियमों के अनुसार, जब वृक्षारोपण को वन गतिविधि माना जाएगा, तब यह दोनों दायित्व लागू नहीं होंगे, जिससे निजी क्षेत्र के लिए लागत काफी कम हो जाएगी।
कार्यान्वयन और राज्यों की भूमिका
संशोधित दिशा-निर्देशों के अनुसार, वृक्षारोपण परियोजनाओं को राज्य सरकार की मंजूरी के साथ कार्य योजना या प्रबंधन योजनाओं के अनुसार चलाना होगा। परियोजनाओं के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनानी होगी, जिसमें क्षेत्र, वृक्ष प्रजाति, क्रियान्वयन विधि और कटाई की सतत सीमाएँ स्पष्ट हों।
राज्य सरकारों को इस नीति के तहत परियोजना उपयोग मॉडल और राजस्व वितरण प्रणाली तय करने की स्वतंत्रता दी गई है। राज्य वन विभाग इन परियोजनाओं की निगरानी करेगा।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) वन भूमि हस्तांतरण पर पारिस्थितिक हानि की भरपाई के लिए लिया जाता है।
- प्रतिपूरक वनीकरण वन उपयोग परिवर्तन की स्थिति में नया वन क्षेत्र विकसित करने की अनिवार्यता है।
- वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 2023 पुराने फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट की जगह लाया गया है।
- राज्य सरकारें अनुमोदित कार्य योजनाओं के तहत वृक्षारोपण की निगरानी करती हैं।
पारिस्थितिकी और समुदायों पर संभावित प्रभाव
पूर्व वन अधिकारियों का मानना है कि NPV और प्रतिपूरक वनीकरण को हटाने से संरक्षण फंडिंग में कमी आएगी और पारिस्थितिक संतुलन कमजोर हो सकता है। पर्यावरणविदों को आशंका है कि इससे बड़े पैमाने पर एक ही प्रकार की वाणिज्यिक वृक्षारोपण (मोनोकल्चर) को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे जैव विविधता को नुकसान होगा और गांवों के आम उपयोग की भूमि सिकुड़ेगी।
आदिवासी अधिकार संगठनों ने चिंता जताई है कि अधिकांश “अपक्षरणग्रस्त वन भूमि” पर परंपरागत वन निवासी समुदायों का कब्जा है। यदि इस भूमि को बिना वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत मान्यता दिए लीज पर दे दिया गया, तो इससे उनकी आजीविका, चराई और लघु वन उत्पादों तक पहुंच पर असर पड़ सकता है।
इस संशोधन से स्पष्ट होता है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ पारिस्थितिक और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी नहीं की जा सकती।