लोनार झील संकट: भारत की एकमात्र बेसाल्टिक उल्का पिंड झील पर पर्यावरणीय खतरा

लोनार झील संकट: भारत की एकमात्र बेसाल्टिक उल्का पिंड झील पर पर्यावरणीय खतरा

महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील, जो कि भारत की एकमात्र बेसाल्टिक उल्का पिंड द्वारा बनी झील है, आज एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट का सामना कर रही है। करीब 50,000 वर्ष पूर्व एक उल्कापिंड की टक्कर से बनी यह झील न केवल भूगर्भीय दृष्टि से अद्वितीय है, बल्कि मंगल ग्रह की भौगोलिक स्थिति की पृथ्वी पर दुर्लभ नकल मानी जाती है। वर्तमान में झील में बेतहाशा बढ़ते मीठे जल प्रवाह ने इसकी पारिस्थितिकी, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत पर गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है।

अनोखी भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक महत्ता

लोनार झील एक बंद जलग्रहण क्षेत्र (Closed Basin) है, जिसमें कोई प्राकृतिक बहिर्गमन नहीं है। यह झील बेसाल्टिक चट्टानों पर उल्का के प्रभाव से बनी है और इसे रामसर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐतिहासिक रूप से इसकी जल संरचना में उच्च क्षारीयता (pH ~11.5) और अत्यधिक लवणता थी, जो मछलियों के लिए प्रतिकूल लेकिन विशिष्ट सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल थी। इसी विशेष रासायनिक वातावरण के कारण यह झील ग्रह विज्ञान और सूक्ष्मजीव अनुसंधान के लिए वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण रही है।

जल स्तर में अप्रत्याशित वृद्धि और दृश्य क्षति

पिछले एक वर्ष में झील का जल स्तर लगभग 20 फीट तक बढ़ गया है, जिससे तट पर स्थित 15 में से 9 प्राचीन मंदिर जलमग्न हो चुके हैं, जिनमें कमालजा देवी मंदिर भी शामिल है। इस संकट को देखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए स्थिति पर जवाब मांगा है।

संकट का मूल कारण: मानवीय हस्तक्षेप

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के जलविज्ञानी अशोक तेजनकर के अनुसार, हालाँकि वर्षा में वृद्धि ने भूमिका निभाई है, लेकिन असल कारण झील के आसपास के क्षेत्र में गहरे बोरवेल्स की बेतरतीब खुदाई है। इन बोरवेल्स ने उन चट्टानी परतों को भेद दिया है जो पहले पानी को रिसने से रोकती थीं, जिससे अब भूमिगत जलस्त्रोत सक्रिय हो गए हैं और उनके माध्यम से मीठा जल झील में लगातार प्रवाहित हो रहा है

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • लोनार झील भारत की एकमात्र बेसाल्टिक उल्का पिंड द्वारा बनी झील है।
  • इसे रामसर स्थल के रूप में अंतरराष्ट्रीय महत्व प्राप्त है।
  • झील का pH स्तर लगभग 11.5 से गिरकर अब 8.5 तक आ गया है।
  • यह एक Closed Basin झील है, यानी इसका कोई सतही जल-निकास नहीं होता।

पारिस्थितिक, सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ

झील में क्षारीयता की कमी से स्थानिक सूक्ष्मजीवों के अस्तित्व पर संकट आ गया है और इतिहास में पहली बार इसमें मछलियाँ जीवित पाई गई हैं। विडंबना यह है कि लोनार नगर खुद पानी की कमी से जूझ रहा है, जबकि झील में पानी का अतिरेक है। विशेषज्ञों ने झरनों के पानी को उपचारित कर नगर में उपयोग करने का सुझाव दिया है, जिससे झील का संतुलन भी बनाए रखा जा सके।

हालाँकि, इन संरक्षण प्रयासों में अनेक अड़चनें हैं:

  • जमीन अधिग्रहण में रुकावट,
  • अनुसंधान हेतु भूमि उपयोग पर विवाद,
  • और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के नियामक प्रतिबंध।

इन बाधाओं के कारण वैश्विक महत्व वाली यह झील अपने भविष्य को लेकर अत्यंत अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। यदि शीघ्र और संतुलित उपाय नहीं किए गए, तो लोनार झील का यह विशिष्ट जैविक और भूवैज्ञानिक स्वरूप सदा के लिए नष्ट हो सकता है।

Originally written on January 28, 2026 and last modified on January 28, 2026.

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