लोकसभा ने वित्त विधेयक 2026 पारित किया: बजट प्रक्रिया अंतिम चरण में
लोकसभा ने वित्त विधेयक 2026 को ध्वनि मत (वॉयस वोट) से पारित कर दिया है, जिसमें सरकार द्वारा प्रस्तावित 33 संशोधनों को मंजूरी दी गई, जबकि विपक्ष के सभी संशोधन खारिज कर दिए गए। इसके साथ ही यह विधेयक अब राज्यसभा में अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा गया है। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने पर वित्त वर्ष 2026–27 के लिए केंद्रीय बजट औपचारिक रूप से लागू हो जाएगा।
बजट प्रावधान और राजकोषीय लक्ष्य
वित्त वर्ष 2026–27 के लिए प्रस्तुत बजट में कुल व्यय ₹53.47 लाख करोड़ निर्धारित किया गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 7.7% अधिक है। सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3% तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है, जो 2025–26 के संशोधित अनुमान 4.4% से थोड़ा कम है। यह दर्शाता है कि सरकार आर्थिक विकास को बनाए रखते हुए वित्तीय अनुशासन (Fiscal Consolidation) पर जोर दे रही है।
सरकार का वित्तीय प्रबंधन पर पक्ष
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बहस के दौरान सरकार के वित्तीय प्रबंधन का बचाव करते हुए बताया कि कोविड-19 के समय राजकोषीय घाटा 9.3% तक पहुंच गया था, जिसे अब घटाकर नियंत्रित स्तर पर लाया गया है। उन्होंने 2008–09 के वैश्विक वित्तीय संकट के समय की तुलना करते हुए आरोप लगाया कि उस दौरान वास्तविक घाटे को छिपाने के लिए देनदारियों को तेल कंपनियों पर स्थानांतरित किया गया था।
ऑयल बॉन्ड और ऋण भुगतान का मुद्दा
वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि वर्तमान सरकार पिछली सरकार द्वारा जारी किए गए ऑयल बॉन्ड के ऋण का भुगतान कर रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग ₹1.3 लाख करोड़ का कर्ज विरासत में मिला था, जिसमें से 2014 से 2024 के बीच ₹1.43 लाख करोड़ चुकाए जा चुके हैं, जिसमें ₹44,650 करोड़ मूलधन शामिल है। इन भुगतानों के कारण विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधनों पर प्रभाव पड़ा है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- वित्त विधेयक बजट के कर प्रस्तावों को लागू करने के लिए आवश्यक होता है।
- राजकोषीय घाटा सरकार के कुल व्यय और कुल आय के बीच का अंतर दर्शाता है।
- ऑयल बॉन्ड का उपयोग तेल कंपनियों को सब्सिडी देने के लिए किया गया था।
- बजट प्रक्रिया को पूर्ण करने के लिए संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।
ऋण और आर्थिक विकास पर बहस
बढ़ते सार्वजनिक ऋण को लेकर उठी चिंताओं के जवाब में सरकार ने कहा कि ऋण का मूल्यांकन जीडीपी के सापेक्ष किया जाना चाहिए। भारत का नाममात्र जीडीपी 2013–14 में ₹113 लाख करोड़ से बढ़कर 2025–26 में ₹345 लाख करोड़ हो गया है। इस मुद्दे पर बहस के दौरान कल्याणकारी योजनाओं, जीएसटी सुधारों और राज्यों द्वारा केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे विषयों पर भी राजनीतिक मतभेद देखने को मिले, जो देश की आर्थिक नीतियों और प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।