लेक विक्टोरिया में स्थायी शैवाल संकट, पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा खतरा
विश्व की सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय झील लेक विक्टोरिया का जल अब स्थायी रूप से विषैले हरे रंग में बदल चुका है। जो कभी मौसमी शैवाल प्रस्फुटन हुआ करते थे, वे अब झील की स्थायी विशेषता बन गए हैं। केन्या, तंजानिया और युगांडा में लगभग 4.7 करोड़ लोग इस झील पर पेयजल, परिवहन और मत्स्य संसाधनों के लिए निर्भर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि दशकों से हो रहे पोषक तत्वों के प्रदूषण ने इस पारिस्थितिकी तंत्र को एक गंभीर सीमा से परे धकेल दिया है।
पोषक तत्वों की अधिकता और यूट्रोफिकेशन
हानिकारक शैवाल प्रस्फुटन यूट्रोफिकेशन नामक प्रक्रिया से उत्पन्न होते हैं, जो अत्यधिक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के कारण होती है। लेक विक्टोरिया के घनी आबादी वाले जलग्रहण क्षेत्र में उर्वरकों का बहाव, बिना शोधन के छोड़ा गया सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, मिट्टी का कटाव और वायुमंडलीय जमाव झील में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा रहे हैं।
वर्षा ऋतु के दौरान संकट और गहरा जाता है, जब वर्षा का जल अपशिष्ट को सहायक नदियों के माध्यम से झील में ले आता है। अध्ययन बताते हैं कि चरम वर्षा के समय न्ज़ोइया नदी प्रतिदिन 22,000 किलोग्राम से अधिक नाइट्रेट झील में पहुंचाती है। पशु मल और सीवेज को इस प्रदूषण का प्रमुख स्रोत माना गया है। तटीय नगरों में तेज जनसंख्या वृद्धि ने स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव डाला है।
एक सदी का पारिस्थितिक परिवर्तन
म्वांज़ा खाड़ी से प्राप्त तलछट नमूनों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यूट्रोफिकेशन की प्रक्रिया 1920 के दशक में शुरू हुई, जब भूमि उपयोग में बड़े पैमाने पर परिवर्तन हुए। 1920 से 1990 के बीच प्राथमिक उत्पादकता में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई। 1990 के दशक के बाद सायनोबैक्टीरिया प्रमुख हो गए, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ गया।
1960 के आसपास जूप्लवक जीवों की जैव मात्रा में तेज गिरावट आई, जिससे खाद्य श्रृंखला प्रभावित हुई। इसके बाद 1980 के दशक में कई देशी सिकलिड मछली प्रजातियों का लोप हुआ। झील के जल स्तर में वृद्धि और जलविज्ञान में परिवर्तन ने आवासों को और अस्थिर बना दिया।
विषैले शैवाल और स्वास्थ्य जोखिम
माइक्रोसिस्टिस जैसे सायनोबैक्टीरिया माइक्रोसिस्टिन नामक यकृत विष उत्पन्न करते हैं, जो कई बार विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षा सीमा से अधिक पाया गया है। शैवाल प्रस्फुटन हमेशा सतह पर दिखाई नहीं देते; विषाक्त तत्व गंदले जल में भी मौजूद रह सकते हैं।
जीनोमिक अनुसंधान में डोलिकोस्पर्मम सहित अनेक सायनोबैक्टीरिया प्रजातियों की पहचान हुई है। वैज्ञानिकों ने सैकड़ों अज्ञात जीन भी खोजे हैं, जो संभावित रूप से नए जैव-सक्रिय यौगिकों की ओर संकेत करते हैं। शैवाल संरचना में निरंतर परिवर्तन इसे एक गतिशील और अप्रत्याशित खतरा बनाता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* लेक विक्टोरिया सतह क्षेत्रफल के आधार पर विश्व की सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय झील है।
* यूट्रोफिकेशन अत्यधिक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस के कारण होता है।
* माइक्रोसिस्टिन कुछ सायनोबैक्टीरिया द्वारा उत्पन्न यकृत विष है।
* लेक विक्टोरिया केन्या, तंजानिया और युगांडा के बीच साझा की जाती है।
झील के गहरे जल में ऑक्सीजन की कमी से मृत क्षेत्र बन रहे हैं, जहाँ जलीय जीवन संभव नहीं रहता। लगभग 3 लाख टन वार्षिक उत्पादन और लगभग 600 मिलियन डॉलर मूल्य की मत्स्य अर्थव्यवस्था अब अस्थिरता का सामना कर रही है। नाइल पर्च, नाइल तिलापिया और दगाआ जैसी प्रमुख मछलियाँ ऑक्सीजन स्तर में उतार-चढ़ाव और खाद्य जाल के विघटन से प्रभावित हो रही हैं। यदि पोषक तत्वों का प्रवाह नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह संकट सीमित मछली मृत्यु से आगे बढ़कर व्यापक पारिस्थितिक पतन का रूप ले सकता है।