लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर के लिए भारत का पहला राष्ट्रीय बायोबैंक स्थापित

लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर के लिए भारत का पहला राष्ट्रीय बायोबैंक स्थापित

भारत में दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए 28 चिकित्सा और शोध संस्थानों ने मिलकर लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (एलएसडी) के लिए देश का पहला सरकारी समर्थित राष्ट्रीय बायोबैंक स्थापित किया है। छह राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों से जुड़े इस पहल में 15 राज्यों के 530 मरीजों के जैविक नमूनों के साथ विस्तृत नैदानिक, जैवरासायनिक और आनुवंशिक आंकड़ों को एकीकृत किया गया है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा वित्तपोषित यह बायोबैंक सस्ती जांच तकनीक और उपचार विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर 70 से अधिक दुर्लभ, वंशानुगत चयापचय संबंधी रोगों का समूह है, जो विशेष एंजाइमों की कमी के कारण उत्पन्न होते हैं। जब ये एंजाइम या उनके सक्रियकर्ता अनुपस्थित होते हैं, तो कोशिकाओं के भीतर वसा और शर्करा का संचय होने लगता है, जिससे धीरे-धीरे अंगों को क्षति पहुंचती है।

भारत में अनुमानित 12,000 से अधिक मरीज इन विकारों से पीड़ित हैं। वर्तमान में केवल कुछ ही दुर्लभ रोगों के लिए उपचार उपलब्ध हैं और एंजाइम प्रतिस्थापन उपचार जैसी थेरेपी की वार्षिक लागत प्रति मरीज एक करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। बायोबैंक में शामिल 530 मरीजों में से लगभग 60 प्रतिशत की मृत्यु हो चुकी है और केवल आठ मरीज उपचार प्राप्त कर रहे हैं।

इस पहल का नेतृत्व अहमदाबाद स्थित फाउंडेशन फॉर रिसर्च इन जेनेटिक्स एंड एंडोक्रिनोलॉजी (एफआरआईजीई) और इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स द्वारा किया जा रहा है। ऑर्फानेट जर्नल ऑफ रेयर डिजीज़ में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, यह बायोबैंक 8 एलएसडी उपसमूहों के अंतर्गत 27 विकारों को कवर करता है।

जैविक नमूनों में रक्त से प्राप्त जीनोमिक डीएनए, प्लाज्मा और मूत्र अवक्षेप शामिल हैं, जिन्हें एंजाइम और आनुवंशिक विश्लेषण के लिए संसाधित किया गया है। दर्ज मामलों में गौशर रोग (70), टे-सैक्स रोग (62), म्यूकोलिपिडोसिस II/III (44) और मोर्क्वियो-ए सिंड्रोम (40) प्रमुख हैं।

यह बायोबैंक एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होता है, जिसमें क्लीनिकल और जीनोमिक डेटा सुरक्षित रूप से संग्रहीत किया जाता है। विभिन्न शोध संस्थान इसका उपयोग नई थेरेपी और स्क्रीनिंग तकनीकों के विकास के लिए कर रहे हैं।

बेंगलुरु स्थित टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी मानव स्टेम सेल आधारित रोग मॉडल विकसित कर रहा है, जबकि इंस्टीट्यूट फॉर स्टेम सेल साइंस एंड रीजनरेटिव मेडिसिन सामान्य उपचार रणनीतियों पर कार्य कर रहा है। सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स स्पेक्ट्रोमेट्री आधारित स्क्रीनिंग तकनीक विकसित करने में जुटा है।

  • लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर एंजाइम की कमी से होने वाले वंशानुगत चयापचय रोग हैं।
  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग भारत सरकार के अंतर्गत जैव-चिकित्सा अनुसंधान को वित्तपोषित करता है।
  • स्टेम सेल आधारित रोग मॉडल आनुवंशिक विकारों के अध्ययन और उपचार परीक्षण में सहायक होते हैं।
  • दुर्लभ रोगों के उपचार में एंजाइम प्रतिस्थापन थेरेपी अत्यधिक महंगी होती है।

राष्ट्रीय स्तर पर डेटा और जैविक नमूनों के केंद्रीकरण से दुर्लभ रोग अनुसंधान में समन्वय की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी। यह पहल प्रारंभिक निदान को तेज करने, स्वदेशी उपचार विकसित करने और उपचार लागत को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इससे प्रभावित परिवारों के लिए बेहतर स्वास्थ्य परिणाम सुनिश्चित करने की उम्मीद है।

Originally written on February 13, 2026 and last modified on February 13, 2026.

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