लक्कुण्डी: नेोलिथिक काल से समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का साक्ष्य
कर्नाटक के गदग जिले के लक्कुण्डी गांव में हाल ही में हुए उत्खनन कार्यों ने नेोलिथिक काल से जुड़ी अवशेषों का पता लगाया है, जिससे इस ऐतिहासिक स्थल की प्राचीनता और सांस्कृतिक परतों का व्यापक महत्व उजागर हुआ है। इस खोज ने लक्कुण्डी को यूनेस्को विश्व धरोहर के रूप में दर्ज करने के प्रयासों को और मजबूती प्रदान की है। लक्कुण्डी का इतिहास सिर्फ मध्यकालीन मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल से इसकी निरंतर बसी होने का प्रमाण भी प्रस्तुत करता है।
लक्कुण्डी: प्राचीनता से विश्व धरोहर तक
16 जनवरी से शुरू हुए उत्खनन कार्य कोंटे वीरभद्रेश्वर मंदिर परिसर में चल रहे हैं, जहां से मिले अवशेष इस क्षेत्र की गहराई से बसे होने का संकेत देते हैं। यह उत्खनन एक नवजीवित पहल का हिस्सा है, जो लक्कुण्डी के ऐतिहासिक महत्व को पुनः स्थापित करने की दिशा में किया जा रहा है। हाल ही में गांव वालों द्वारा घर की नींव खोदते समय महत्वपूर्ण कलाकृतियों का पाए जाना इस क्षेत्र की पुरातात्विक संभावनाओं को सामने लाया।
लक्कुण्डी गदग शहर से लगभग 12 किमी दूर स्थित है और ऐतिहासिक रूप से “सौ बावड़ियों और मंदिरों का गांव” कहलाता था। ऐसा माना जाता है कि कई प्राचीन मंदिर और संरचनाएँ आज भी जमीन के नीचे दबी हुई हैं, जिनका पता अब धीरे-धीरे उत्खनन के माध्यम से लग रहा है।
लक्कुण्डी की ऐतिहासिक यात्रा
पहले यह स्थल लोक्किगुंडी के नाम से प्रसिद्ध था और 11वीं व 12वीं शताब्दी के शिलालेखों में इसका उल्लेख मिलता है। इन शिलालेखों में इसे अमरावती के समान समृद्ध कहकर वर्णित किया गया है, जो अपने समय की एक महत्वपूर्ण और समृद्ध राजनीतिक तथा सांस्कृतिक नगरी थी। मध्यकाल में लक्कुण्डी चालुक्य, यादव और होयसल शासकों के अधीन फल-फूलते रहे।
1192 ईस्वी में यह होयसल शासक इत्ताधी बाल्लाल के राज्य का राजधानी केन्द्र भी रहा, जो उसके राजनीतिक तथा आर्थिक महत्व को दर्शाता है। यहां एक “टंकाशाला” अर्थात् चाँदी-चांदी के सिक्कों की ढलाई की कार्यशाला भी थी, जिससे लक्कुण्डी के व्यापारिक महत्व का पता चलता है।
धार्मिक विविधता और स्थापत्य कला
लक्कुण्डी सिर्फ राजनीतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता और कला की मिसाल भी रहा है। 11वीं सदी की जैन धर्मप्रेमी रानी अत्तिमाब्बे ने अनेक मंदिरों, जैन बणासिदियों और बावड़ियों का निर्माण कराया। इसके अलावा 12वीं सदी के श्राणों जैसे शिवाशरण अजगण्णा तथा मुक्तयक्का से यह भी जुड़ा रहा, जो भगवान बसवेश्वर की भक्ति आंदोलन से जुड़े मुख्य संत थे।
हालांकि कई प्राचीन स्मारक अब विद्यमान नहीं हैं, किंतु रिकॉर्ड में 13 मंदिरों का उल्लेख मिलता है, जो कल्याण चालुक्य वास्तुकला शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। साथ ही इन मंदिरों के पास सुशोभित नक्काशीदार बावड़ियाँ भी आज भी मौजूद हैं, जो लक्कुण्डी की सामुदायिक जल प्रबंधन प्रणाली और स्थापत्य कौशल को दर्शाती हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- लक्कुण्डी कर्नाटक के गदग जिले में स्थित है।
- यहाँ के उत्खनन में नेोलिथिक काल के अवशेष मिले हैं, जो मध्यकाल से भी पहले की बस्तियों का संकेत देते हैं।
- लक्कुण्डी कई मध्यकालीन राजवंशों जैसे चालुक्य, यादव और होयसल के शासन काल में फल-फूला।
- रानी अत्तिमाब्बे, 11वीं सदी की जैन धर्मप्रेमी महिला, लक्कुण्डी के विकास में एक प्रमुख योगदानकर्ता थीं।
यूनेस्को विश्व धरोहर की दिशा में कदम
कर्नाटक सरकार ने पर्यटन मंत्री एच. के. पाटिल के नेतृत्व में लक्कुण्डी के संरक्षण और उत्खनन योजनाओं को पुनर्जीवित किया है। कर्नाटक स्टेट टूरिज़्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन तथा पुरातत्व, संग्रहालय और धरोहर विभाग ने स्थानीय घरों से अब तक 1,050 से अधिक कलाकृतियाँ एकत्र की हैं, जिनमें से कई को एक खुले संग्रहालय में प्रदर्शित किया जा रहा है।
राज्य ने भारतीय राष्ट्रीय कला और सांस्कृतिक धरोहर संस्था (INTACH) के साथ मिलकर लक्कुण्डी और आसपास के मंदिरों को यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल करने का प्रस्ताव अंतिम रूप देने की प्रक्रिया शुरू की है। आगे की सर्वेक्षण गतिविधियाँ इस स्थल की और खोजों को सामने ला सकती हैं और संभावित यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल होने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
लक्कुण्डी की यह ऐतिहासिक खोज न केवल भारत के प्राचीन अतीत की समृद्ध परतों को उजागर करती है, बल्कि विश्व स्तर पर इसकी सांस्कृतिक विरासत की मान्यता को भी मजबूती प्रदान करती है।