राज्यपाल और राज्य विधानसभाओं में अभिभाषण विवाद: संवैधानिक मर्यादा पर बहस

राज्यपाल और राज्य विधानसभाओं में अभिभाषण विवाद: संवैधानिक मर्यादा पर बहस

हाल ही में कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्ष-शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा राज्य विधानसभाओं के प्रारंभिक सत्रों से वाकआउट या अभिभाषण में चयनात्मक पाठ जैसी घटनाओं ने भारत के संघीय ढांचे में राज्यपाल की भूमिका पर गहरी संवैधानिक बहस को जन्म दिया है। यह घटनाएं उस सीमित संवैधानिक भूमिका से विचलन मानी जा रही हैं, जो भारत के संसदीय लोकतंत्र में राज्यपाल के लिए कल्पित की गई थी।

अनुच्छेद 176 और राज्यपाल का अभिभाषण

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 176(1) यह अनिवार्य करता है कि राज्यपाल प्रत्येक वर्ष पहले सत्र के प्रारंभ में राज्य विधानसभा (या जहां विधान परिषद हो, वहां दोनों सदनों) को संबोधित करें। यह अभिभाषण राज्यपाल की निजी राय नहीं बल्कि निर्वाचित राज्य सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का औपचारिक प्रस्तुतीकरण होता है। संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि राज्यपाल को इस अभिभाषण के किसी भी भाग को छोड़ने, संशोधित करने या पढ़ने से इनकार करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है, क्योंकि यह मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होता है।

राज्यपाल के विवेकाधिकार पर न्यायिक दृष्टिकोण

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल का विवेकाधिकार अत्यंत सीमित है। 1974 के “शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य” मामले में सात-न्यायाधीशीय पीठ ने निर्णय दिया कि मंत्रिपरिषद की नीति की सार्वजनिक आलोचना राज्यपाल द्वारा करना असंवैधानिक चूक है। इसके बाद 2016 के “नबाम रेबिया बनाम अरुणाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष” निर्णय में संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 175(1) और 176(1) के अंतर्गत राज्यपाल की भूमिका कार्यकारी प्रकृति की है और उसे पूरी तरह मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही किया जाना चाहिए।

संसदीय लोकतंत्र में राज्यपाल की भूमिका

संविधान सभा की बहसों में डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने राज्यपाल को “कर्तव्यों वाला संवैधानिक प्रमुख” बताया था, जिसे स्वतंत्र कार्यकारी शक्तियाँ नहीं दी गईं। राज्यपाल को जनप्रतिनिधियों का निष्पक्ष संरक्षक माना गया था, न कि किसी राजनैतिक दल का प्रतिनिधि। न्यायालय ने चेतावनी दी है कि यदि राज्यपाल को व्यापक विवेकाधिकार की छूट दी जाए, तो यह संसदीय लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है और निर्वाचित सरकारों व संवैधानिक प्रमुखों के बीच संतुलन बिगाड़ सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • अनुच्छेद 176 राज्यपाल के राज्य विधानमंडल के अभिभाषण से संबंधित है।
  • राज्यपाल, मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं।
  • “शमशेर सिंह मामला (1974)” में राज्यपाल की नीति आलोचना को सीमित किया गया।
  • “नबाम रेबिया निर्णय (2016)” में अनुच्छेद 175 और 176 को कार्यकारी कर्तव्य माना गया।

राज्यपालों द्वारा हालिया वाकआउट और अभिभाषणों के अपूर्ण पाठ ने एक संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न की है, जहां निर्वाचित सरकारें और संवैधानिक प्रमुख आमने-सामने नजर आते हैं। यदि इस स्थिति में न्यायिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है, तो यह संघीय संतुलन को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा और भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करेगा।

Originally written on January 26, 2026 and last modified on January 26, 2026.

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