राजस्थान के बारां जिले में दुर्लभ रस्टी-स्पॉटेड कैट की जीवित उपस्थिति दर्ज, कैमरा ट्रैप में पहली बार दिखी
राजस्थान के बारां जिले के शेरगढ़ वन क्षेत्र में दुनिया की सबसे छोटी जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक रस्टी-स्पॉटेड कैट की जीवित उपस्थिति पहली बार कैमरा ट्रैप में दर्ज की गई है। यह महत्वपूर्ण खोज हाड़ौती क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर मानी जा रही है।
शेरगढ़ अभयारण्य में कैमरा ट्रैप से मिला सबूत
कोटा के उप वन संरक्षक (DCF) अनुराग भटनागर के अनुसार, रस्टी-स्पॉटेड कैट की पहली तस्वीर जनवरी में शेरगढ़ अभयारण्य में लगे कैमरा ट्रैप में कैद हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि इस elusive (दुर्लभ व छिपी रहने वाली) प्रजाति की उपस्थिति इस बात का संकेत हो सकती है कि यहां उसका स्थायी क्षेत्र या परिवार भी मौजूद है। अब और अधिक कैमरा ट्रैप लगाए जा रहे हैं ताकि जानवर के लिंग की पहचान हो सके और यह स्पष्ट हो सके कि इस क्षेत्र में कितने अन्य सदस्य मौजूद हैं।
पूर्ववर्ती रिकॉर्ड से क्षेत्रीय उपस्थिति की पुष्टि
वन अधिकारियों ने बताया कि दिसंबर 2023 में शाहाबाद क्षेत्र में सड़क दुर्घटना में एक रस्टी-स्पॉटेड कैट मृत पाई गई थी, जिसकी तस्वीरों से इसकी पहचान की गई थी। अब जीवित कैट की उपस्थिति इस बात को और मज़बूती देती है कि यह प्रजाति हाड़ौती क्षेत्र के जंगलों में निवास कर रही है और मानवीय दबावों के बावजूद स्थानीय पर्यावरण के अनुकूल हो रही है।
व्यवहार व संरक्षण स्थिति
रस्टी-स्पॉटेड कैट को IUCN द्वारा ‘नियर थ्रेटेंड’ श्रेणी में रखा गया है। यह प्रजाति अत्यधिक संकोची और रात्रिचर (निशाचर) होती है, और प्रजनन काल को छोड़कर अकेली रहती है। इसी कारण इसके दर्शन दुर्लभ होते हैं, यहां तक कि उन क्षेत्रों में भी जहां यह ज्ञात रूप से मौजूद है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- रस्टी-स्पॉटेड कैट दुनिया की सबसे छोटी जंगली बिल्ली प्रजातियों में से एक है।
- इसे IUCN द्वारा ‘Near Threatened’ श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है।
- यह प्रजाति रात्रिचर, एकाकी और अत्यंत दुर्लभ होती है।
- इसकी उपस्थिति राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दक्षिण भारत के जंगलों में दर्ज की गई है।
पारिस्थितिकीय भूमिका और व्यापक वितरण
हालांकि रस्टी-स्पॉटेड कैट एक मांसाहारी प्रजाति है, यह पारिस्थितिकीय दृष्टि से बीजों के प्रसार में भी भूमिका निभाती है। इसके शरीर से बीज और फल चिपक कर जंगलों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते हैं, जिससे प्राकृतिक पुनरुत्पत्ति में सहायता मिलती है। अधिकारियों ने इस खोज को हाड़ौती के वन क्षेत्रों की जैव विविधता और पारिस्थितिकीय महत्त्व का प्रमाण बताया है। साथ ही, उन्होंने वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु बेहतर सड़क सुरक्षा उपायों और वन संरक्षण के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
यह खोज दर्शाती है कि सतर्क निगरानी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किए गए प्रयासों से हमें अब तक अनदेखे वन्यजीवों की उपस्थिति का सटीक ज्ञान मिल सकता है, जो संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक है।