राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल: विज्ञान और कूटनीति के संगम की नई शुरुआत

राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल: विज्ञान और कूटनीति के संगम की नई शुरुआत

नई दिल्ली के भारत मंडपम में 5 मार्च 2026 को पहली बार राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल का आयोजन किया गया। यह पहल राइसीना डायलॉग के तहत आयोजित की गई और इसे भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय तथा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से शुरू किया। इस कार्यक्रम में दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिकों, राजनयिकों, नवप्रवर्तकों और नीति विशेषज्ञों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य वैश्विक चुनौतियों और तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में विज्ञान कूटनीति की भूमिका पर चर्चा करना था। इस बंद-द्वार बैठक में लगभग 80 प्रतिभागियों ने भाग लिया और विचारों का खुलकर आदान-प्रदान किया।

बदलते वैश्विक परिदृश्य में विज्ञान कूटनीति की भूमिका

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में यह रेखांकित किया गया कि आज के समय में विज्ञान और प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक सुरक्षा रणनीतियों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बन चुके हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि विज्ञान कूटनीति अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच संवाद बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनती जा रही है।

चर्चा के दौरान यह भी बताया गया कि उभरती तकनीकों और वैश्विक चुनौतियों के साथ विज्ञान कूटनीति के ढांचे को भी लगातार विकसित करने की आवश्यकता है। इस पहल का उद्देश्य वैज्ञानिक सहयोग, कूटनीतिक संवाद और अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करना है।

रणनीतिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक सहयोग

पहला गोलमेज सत्र “रणनीतिक स्वायत्तता के युग में विज्ञान कूटनीति” विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय के वैज्ञानिक सचिव डॉ. परविंदर मैनी ने की।

इस चर्चा में यह विचार किया गया कि देश अपने राष्ट्रीय रणनीतिक हितों और वैज्ञानिक अनुसंधान की सहयोगात्मक प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाए रख सकते हैं। प्रतिभागियों ने कहा कि वैज्ञानिक सहयोग भू-राजनीतिक तनाव के समय भी देशों के बीच संवाद का पुल बन सकता है। इसके लिए विश्वसनीय अनुसंधान नेटवर्क, पारदर्शी वैज्ञानिक प्रणालियों और बेहतर जोखिम मूल्यांकन तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

विघटनकारी तकनीकों का वैश्विक शासन

दूसरा गोलमेज सत्र विघटनकारी तकनीकों के शासन पर केंद्रित था और इसकी अध्यक्षता जिनेवा साइंस एंड डिप्लोमेसी एंटिसिपेटर की महानिदेशक प्रोफेसर मैरिलिन एंडरसन ने की। इस सत्र में चर्चा की गई कि उभरती तकनीकों के लिए भविष्य उन्मुख नीतिगत ढांचे और समावेशी वैश्विक शासन व्यवस्था की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि नई तकनीकों के संभावित जोखिमों को कम करने और उनके सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है। साथ ही तकनीकी विकास में नैतिक मूल्यों, बहुपक्षीय सहयोग और प्रारंभिक अनुसंधान क्षेत्रों में साझेदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

भविष्य की दिशा और पहल का महत्व

इस पहल के दौरान विज्ञान कूटनीति के ऐतिहासिक विकास और सरकारों के अलावा अन्य संस्थानों की बढ़ती भूमिका पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि अनुसंधान संस्थान, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और तकनीकी गठबंधनों की भागीदारी वैश्विक शासन प्रणाली को प्रभावित कर सकती है।

राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल को एक वार्षिक मंच के रूप में विकसित करने की योजना है। भविष्य में इस मंच पर विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा होने की उम्मीद है। साथ ही निजी क्षेत्र की भूमिका और वैश्विक स्तर पर तकनीकी संसाधनों की समान पहुंच जैसे विषयों पर भी विचार किया जाएगा।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल वर्ष 2026 में राइसीना डायलॉग के साथ शुरू की गई।
  • यह पहल प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई।
  • विज्ञान कूटनीति का अर्थ वैज्ञानिक सहयोग के माध्यम से वैश्विक समस्याओं का समाधान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करना है।
  • अंतरराष्ट्रीय विज्ञान परिषद के अध्यक्ष सर पीटर ग्लकमन वैश्विक विज्ञान कूटनीति के प्रमुख विशेषज्ञों में से एक हैं।

राइसीना साइंस डिप्लोमेसी पहल विज्ञान और कूटनीति के बीच बढ़ते संबंध को दर्शाती है। यह मंच वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए वैज्ञानिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय नीति संवाद को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

Originally written on March 6, 2026 and last modified on March 6, 2026.

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