रतापानी टाइगर रिजर्व में पहली बार दिखा दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्ता (ढोल): मध्य भारत में वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा

रतापानी टाइगर रिजर्व में पहली बार दिखा दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्ता (ढोल): मध्य भारत में वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा

मध्य प्रदेश के रतापानी टाइगर रिजर्व में पहली बार दुर्लभ एशियाई जंगली कुत्ते (Dhole) की उपस्थिति दर्ज की गई है। इस संकटग्रस्त प्रजाति की तस्वीरें हाल ही में वन विभाग द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप में कैद हुईं, जिससे जैव विविधता की निगरानी और संरक्षण प्रयासों को एक महत्वपूर्ण बढ़ावा मिला है।

रतापानी वन क्षेत्र में पहली बार ढोल की पुष्टि

मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) शुभरंजन सेन के अनुसार, यह कैमरा ट्रैप चित्रों का वैज्ञानिक सत्यापन होने के बाद स्पष्ट हुआ कि रतापानी अब शीर्ष शिकारी प्रजातियों के लिए अनुकूल आवास बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रजातियों की वापसी यह संकेत देती है कि आरक्षित वन क्षेत्र की पारिस्थितिकी धीरे-धीरे सुदृढ़ हो रही है।

ढोल का पारिस्थितिक महत्व

ढोल अत्यंत सामाजिक और रणनीतिक शिकारी होता है, जो आमतौर पर 14 से 20 सदस्यों के समन्वित झुंड में शिकार करता है। इसका प्रमुख शिकार चीतल, सांभर और अन्य मृग होते हैं। वन अधिकारियों के अनुसार, ढोल में बाघ और तेंदुए जैसे शीर्ष शिकारी प्रजातियों से भी शिकार के लिए प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता होती है, जिससे वह पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाता है।

2026 में दर्ज छठी दुर्लभ प्रजाति

वर्ष 2026 में अब तक रतापानी टाइगर रिजर्व में यह छठी दुर्लभ वन्यजीव प्रजाति है जो कैमरे में दर्ज की गई है। शुभरंजन सेन ने बताया कि इन निरंतर दुर्लभ प्रजातियों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि वन्यजीव संरक्षण प्रयासों से ठोस परिणाम सामने आ रहे हैं। यदि वर्तमान सुरक्षा उपायों को जारी रखा गया, तो रतापानी मध्य भारत में संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए एक प्रमुख शरणस्थली बन सकता है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • ढोल IUCN रेड लिस्ट में असुरक्षित (Endangered) श्रेणी में सूचीबद्ध है।
  • रतापानी टाइगर रिजर्व, मध्य प्रदेश में स्थित है।
  • कैमरा ट्रैपिंग वन्यजीव निगरानी की एक प्रमुख तकनीक है।
  • शीर्ष शिकारी प्रजातियाँ पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और स्थिरता का संकेत देती हैं।

संरक्षण दृष्टिकोण और व्यापक प्रभाव

वन्यजीव विशेषज्ञ अमेय विक्रम सिंह के अनुसार, ढोल के अस्तित्व पर आवास हानि, शिकार प्रजातियों की कमी और मानवीय हस्तक्षेप जैसी गंभीर चुनौतियाँ हैं। उन्होंने रतापानी में इसकी उपस्थिति को संरक्षण की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि बताया, विशेषकर जब अब ढोल अमरकंटक से बैतूल तक के वनों में गतिशील दिखाई दे रहे हैं। पहले इनकी उपस्थिति केवल कान्हा, बांधवगढ़ और पेंच जैसे आरक्षित वनों तक सीमित थी।

ढोल जैसे संकटग्रस्त शिकारी की पुष्टि रतापानी के पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती और दीर्घकालिक वन्यजीव संरक्षण की आशा को पुनर्जीवित करती है। यह सफलता मध्य भारत में संरक्षित क्षेत्रों की महत्ता और वन प्रबंधन की दिशा में चल रही नीतिगत पहलों की सकारात्मक दिशा को दर्शाती है।

Originally written on January 26, 2026 and last modified on January 26, 2026.

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