यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशन को झटका, एक अंतरिक्ष यान से संपर्क टूटा

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रोबा-3 मिशन को झटका, एक अंतरिक्ष यान से संपर्क टूटा

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के महत्वाकांक्षी प्रोबा-3 मिशन को हाल ही में तकनीकी झटका लगा है। इस मिशन का उद्देश्य सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना का अध्ययन करना है, लेकिन इसके दो अंतरिक्ष यानों में से एक से संपर्क टूट गया है। वैज्ञानिक कृत्रिम सौर ग्रहण बनाकर सूर्य के कोरोना की विस्तृत तस्वीरें लेने का प्रयास कर रहे थे। मिशन के दौरान कोरोनाग्राफ नामक अंतरिक्ष यान में तकनीकी समस्या आने के बाद उसका नियंत्रण और पृथ्वी से संपर्क बाधित हो गया।

अंतरिक्ष यान की दिशा नियंत्रण प्रणाली में आई समस्या

फरवरी 2026 के मध्य में एक तकनीकी गड़बड़ी के कारण कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान की एटीट्यूड कंट्रोल प्रणाली प्रभावित हो गई। एटीट्यूड कंट्रोल वह प्रणाली होती है जो किसी उपग्रह को अंतरिक्ष में सही दिशा में बनाए रखती है। इस गड़बड़ी के कारण अंतरिक्ष यान के सोलर पैनल सूर्य की ओर नहीं रह पाए, जिससे उसे पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं हो सकी। परिणामस्वरूप उसकी बैटरी तेजी से समाप्त होने लगी और उपग्रह को “सर्वाइवल मोड” में जाना पड़ा। इस स्थिति में केवल आवश्यक प्रणालियां सक्रिय रहती हैं और पृथ्वी से संचार बंद हो जाता है।

प्रोबा-3 का अनोखा दो अंतरिक्ष यान वाला डिजाइन

प्रोबा-3 मिशन की विशेषता इसका दो अंतरिक्ष यानों वाला डिजाइन है, जो एक साथ समन्वित तरीके से काम करते हैं। इसमें कोरोनाग्राफ उपग्रह और ऑकल्टर उपग्रह शामिल हैं। ऑकल्टर सूर्य के तेज प्रकाश को अवरुद्ध करता है, जिससे कोरोनाग्राफ सूर्य के कोरोना की स्पष्ट तस्वीरें ले सकता है। इस प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए दोनों अंतरिक्ष यानों को पृथ्वी की कक्षा में लगभग 150 मीटर की दूरी पर अत्यंत सटीक तरीके से उड़ान भरनी होती है। इस तकनीक को फॉर्मेशन फ्लाइंग कहा जाता है।

कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान को पुनः सक्रिय करने के प्रयास

मिशन से जुड़े वैज्ञानिक और इंजीनियर अब कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान से संपर्क बहाल करने के लिए विभिन्न उपायों पर काम कर रहे हैं। ऑकल्टर उपग्रह अभी भी पूरी तरह कार्यशील है और उसे खराब हुए उपग्रह के पास ले जाकर उसकी स्थिति का अवलोकन करने की योजना बनाई जा रही है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि अंतरिक्ष यान किस दिशा में है और उसे फिर से नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। दिसंबर 2024 में लॉन्च होने के बाद यह मिशन अब तक 60 से अधिक फॉर्मेशन फ्लाइंग कक्षाएं सफलतापूर्वक पूरा कर चुका है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सूर्य का कोरोना सूर्य के वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है, जो सामान्यतः पूर्ण सूर्य ग्रहण के समय दिखाई देती है।
  • प्रोबा-3 मिशन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा दिसंबर 2024 में लॉन्च किया गया था।
  • इस मिशन में दो अंतरिक्ष यान लगभग 150 मीटर की दूरी बनाए रखते हुए कृत्रिम सौर ग्रहण बनाते हैं।
  • फॉर्मेशन फ्लाइंग तकनीक में कई अंतरिक्ष यान कक्षा में सटीक दूरी और स्थिति बनाए रखते हुए एक साथ कार्य करते हैं।

सौर कोरोना का अध्ययन अंतरिक्ष विज्ञान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यही क्षेत्र सौर हवाओं और कोरोनल मास इजेक्शन जैसी घटनाओं से जुड़ा होता है, जो अंतरिक्ष मौसम को प्रभावित करती हैं। इन घटनाओं का असर पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, संचार प्रणालियों और बिजली ग्रिड पर भी पड़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के बेहतर अध्ययन से अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी अधिक सटीक हो सकेगी और आधुनिक तकनीकी ढांचे को संभावित खतरों से बचाने में मदद मिलेगी।

Originally written on March 11, 2026 and last modified on March 11, 2026.

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