मासिक धर्म स्वास्थ्य को गरिमा के अधिकार का हिस्सा: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य गरिमा के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है और इसे संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। यह फैसला “पीरियड पॉवर्टी” जैसे मुद्दों को सार्वजनिक नीति और समानता के दृष्टिकोण से देखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल शौचालय निर्माण और नल कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उनका प्रभावी उपयोग सुनिश्चित न हो और मासिक धर्म से जुड़ी वंचनाएं वास्तव में समाप्त न हों।
कार्यान्वयन में कमियां और प्रशासनिक चुनौतियां
न्यायालय ने पाया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने तीन वर्ष पूर्व जारी निर्देशों के बावजूद मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन नीतियों पर कोई जवाब नहीं दिया। पेयजल एवं स्वच्छता, महिला एवं बाल विकास तथा शिक्षा जैसे प्रमुख मंत्रालयों के अंतर्गत अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही मासिक धर्म सीधे तौर पर आबादी के एक हिस्से को प्रभावित करता हो, लेकिन गरिमापूर्ण मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार व्यापक संवैधानिक सुरक्षा का पात्र है। यह निर्णय समानता के सिद्धांत को व्यवहारिक रूप देने की आवश्यकता पर बल देता है।
स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका पर प्रभाव
अपर्याप्त मासिक धर्म प्रबंधन का असर स्वास्थ्य, शिक्षा, गतिशीलता और आजीविका पर पड़ता है। प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (पीएमएस), प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (पीएमडीडी) और एंडोमेट्रियोसिस जैसी स्थितियां व्यापक रूप से अल्प-निदानित रहती हैं, जिससे जीवन की गुणवत्ता और प्रजनन स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
एक सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणाली दृष्टिकोण में मासिक धर्म के प्रति जागरूकता को सामान्य बनाना शामिल है, ताकि लोग स्वस्थ चक्र और चिकित्सकीय ध्यान की आवश्यकता वाले लक्षणों में अंतर कर सकें। न्यायालय ने रेखांकित किया कि समानता केवल प्रतीकात्मक मान्यता से नहीं, बल्कि निरंतर राज्य कार्रवाई से सुनिश्चित होती है।
शिक्षा, पर्यावरण और लैंगिक दृष्टिकोण
लैंगिक-संवेदनशील और समावेशी मासिक धर्म शिक्षा को सभी छात्रों के लिए अनिवार्य माना गया है, ताकि सामाजिक कलंक को समाप्त किया जा सके। जिम्मेदार शिक्षा में डिस्पोजेबल और पुन: प्रयोज्य दोनों प्रकार के उत्पादों की सही जानकारी शामिल होनी चाहिए।
पर्यावरणीय स्थिरता भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। कपड़े के पैड, मेंस्ट्रुअल कप और पीरियड अंडरवियर जैसे पुन: प्रयोज्य विकल्प कचरे और लागत को कम करते हैं, बशर्ते पर्याप्त जल और गोपनीयता अवसंरचना उपलब्ध हो। Bureau of Indian Standards द्वारा पुन: प्रयोज्य उत्पादों के लिए गुणवत्ता मानक निर्धारित किए गए हैं, जो उपभोक्ता सुरक्षा को मजबूत करते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
* भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है।
* ‘राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम’ किशोरों के स्वास्थ्य मुद्दों पर केंद्रित है।
* मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन सतत विकास लक्ष्यों में स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और स्वच्छता से जुड़ा है।
* भारतीय मानक ब्यूरो उपभोक्ता उत्पादों के लिए गुणवत्ता मानदंड निर्धारित करता है।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य को कल्याणकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि अधिकार और समानता के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। संवैधानिक मंशा को व्यवहार में उतारने के लिए सरकार और नागरिक समाज के बीच समन्वित सहयोग, जवाबदेही और प्रभावी निगरानी तंत्र की आवश्यकता होगी, ताकि हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण और सुरक्षित मासिक धर्म प्रबंधन उपलब्ध हो सके।