मानसून के दौरान बढ़ते ‘मॉइस्ट हीटवेव’ पर नया वैज्ञानिक अध्ययन
भारत के कई हिस्सों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान ‘मॉइस्ट हीटवेव’ की घटनाएँ देखी जाती हैं, लेकिन इस घटना को लंबे समय तक ठीक से समझा नहीं गया था। हाल ही में “क्लाइमेट डायनेमिक्स” पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पाया गया है कि इन घटनाओं का समय और स्थान मानसून के सक्रिय और विराम चरणों से गहराई से जुड़ा होता है। अध्ययन के अनुसार अब इन मॉइस्ट हीटवेव की संभावना दो से चार सप्ताह पहले तक अनुमानित की जा सकती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों को बेहतर बनाया जा सकता है।
मॉइस्ट हीटवेव क्या होते हैं?
सामान्य गर्मियों में आने वाले शुष्क हीटवेव मुख्यतः उच्च तापमान के कारण होते हैं, जबकि मॉइस्ट हीटवेव उच्च तापमान के साथ अत्यधिक आर्द्रता के संयोजन से उत्पन्न होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में शरीर की पसीने के माध्यम से स्वयं को ठंडा करने की क्षमता कम हो जाती है।
अधिक आर्द्रता त्वचा से पसीने के वाष्पीकरण को रोकती है, जिससे शरीर पर तापीय तनाव बढ़ जाता है। इससे हाइपरथर्मिया, हीट एक्सॉशन और गंभीर परिस्थितियों में घातक हीटस्ट्रोक तक हो सकता है। विशेष रूप से खुले स्थानों में लंबे समय तक रहने या भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों में यह जोखिम अधिक होता है।
वेट बल्ब तापमान और मानव सहनशीलता
तापमान और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव को मापने के लिए ‘वेट बल्ब तापमान’ का उपयोग किया जाता है। यह वह न्यूनतम तापमान दर्शाता है, जिसे हवा निरंतर दबाव में वाष्पीकरण के माध्यम से प्राप्त कर सकती है। इससे यह समझा जा सकता है कि मानव शरीर पसीने के माध्यम से कितनी प्रभावी ढंग से ठंडा हो सकता है।
पहले 35 डिग्री सेल्सियस वेट बल्ब तापमान को मानव जीवन के लिए अधिकतम सहनशील सीमा माना जाता था। हालांकि 2023 में “नेचर कम्युनिकेशंस” में प्रकाशित एक अध्ययन ने इससे कम सहनशीलता स्तर दिखाए। इसमें पाया गया कि युवा वयस्कों के लिए यह सीमा लगभग 25.8°C से 34.1°C के बीच हो सकती है, जबकि वृद्ध व्यक्तियों के लिए यह सीमा 21.9°C से 33.7°C के बीच है। विशेष रूप से वृद्ध महिलाओं में सहनशीलता सबसे कम पाई गई।
मानसून के सक्रिय और विराम चरण से संबंध
अध्ययन में 1940 से 2023 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि मॉइस्ट हीटवेव का जोखिम मानसून के सक्रिय और विराम चरणों के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानांतरित होता है।
जब मानसून सक्रिय चरण में होता है, तब उत्तरी मैदानों और मध्य भारत में तापमान और आर्द्रता के संयोजन के कारण मॉइस्ट हीटवेव का खतरा अधिक होता है। वहीं मानसून के विराम चरण में जब वर्षा हिमालय की तराई और पूर्वोत्तर भारत की ओर खिसक जाती है, तब दक्षिण और पूर्वी भारत में इसका जोखिम बढ़ जाता है। यह परिवर्तन मानसून ट्रफ की स्थिति और शुष्क मरुस्थलीय हवाओं के प्रभाव से जुड़ा होता है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- वेट बल्ब तापमान तापमान और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव को मापने का सूचक है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून में सक्रिय और विराम चरण वर्षा के वितरण को प्रभावित करते हैं।
- बोरेल समर इंट्रासीज़नल ऑसिलेशन 30 से 90 दिन का मौसमीय पैटर्न है जो मानसून की गतिविधि को प्रभावित करता है।
- मॉइस्ट हीटवेव में उच्च आर्द्रता के कारण तापीय तनाव अधिक होता है, जबकि शुष्क हीटवेव मुख्यतः तापमान से संबंधित होते हैं।
अध्ययन के अनुसार मॉइस्ट हीटवेव का संबंध बोरेल समर इंट्रासीज़नल ऑसिलेशन से भी है, जो हिंद महासागर से पश्चिमी प्रशांत तक फैलने वाला 30 से 90 दिनों का मौसमीय पैटर्न है। इसकी कुछ अवस्थाएँ उत्तरी भारत में हीटवेव के जोखिम को सामान्य से 125 प्रतिशत तक बढ़ा सकती हैं। बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली के माध्यम से प्रशासन समय रहते बड़े आयोजनों का समय बदल सकता है, अस्पतालों की तैयारी बढ़ा सकता है और कूलिंग सेंटर खोल सकता है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के बीच ऐसे पूर्व चेतावनी तंत्र भारत में स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।