महाराष्ट्र में गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम की सफलता: मेलघाट और ताडोबा में प्रवासी गिद्धों की वापसी
महाराष्ट्र के लंबे समय से चल रहे गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम ने एक अहम पारिस्थितिक मील का पत्थर हासिल किया है। करीब एक दशक तक स्थानीय रूप से विलुप्त माने जाने वाले प्रवासी गिद्ध अब मेलघाट और ताडोबा के जंगलों में लौट आए हैं। हाल ही में मेलघाट टाइगर रिज़र्व में हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध और ताडोबा-अंधारी टाइगर रिज़र्व में यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध की उपस्थिति दर्ज की गई है, जो इस कार्यक्रम की प्रारंभिक सफलता और बेहतर हो रहे पर्यावास की पुष्टि करती है।
मेलघाट और ताडोबा में प्रवासी गिद्धों की वापसी
हिमालयन ग्रिफॉन गिद्ध, जो सामान्यतः उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, भारत के कई हिस्सों में मौसमी प्रवास करते हैं। मेलघाट में इसकी उपस्थिति वर्षों बाद दर्ज हुई, जबकि ताडोबा में यूरेशियन ग्रिफॉन की वापसी ने इन दोनों संरक्षित क्षेत्रों में गिद्धों के पुनर्स्थापन की दिशा में प्रगति को स्पष्ट किया है।
करीब दस साल पहले इन इलाकों से गिद्ध पूरी तरह गायब हो गए थे। अब इनकी वापसी न केवल पारिस्थितिक पुनर्स्थापन का संकेत देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि संरक्षण प्रयास सही दिशा में बढ़ रहे हैं।
गिरावट के कारण और संरक्षण प्रयास
2004 तक महाराष्ट्र में गिद्धों की संख्या में तीव्र गिरावट देखी गई। इसका मुख्य कारण था पशुओं के इलाज में उपयोग किए जा रहे दर्द निवारक दवाओं—डाइक्लोफेनाक, एसिक्लोफेनाक, कीटोप्रोफेन और निमेसुलाइड—का फैलाव। इन दवाओं से उपचारित पशु शवों को खाने से गिद्धों की मृत्यु हो जाती थी।
इस संकट से निपटने के लिए महाराष्ट्र वन विभाग ने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के साथ मिलकर एक समर्पित गिद्ध पुनर्जीवन कार्यक्रम शुरू किया। इसमें कैप्टिव ब्रीडिंग, पर्यावास सुरक्षा और वैज्ञानिक तरीके से गिद्धों को नियंत्रित रूप से जंगल में छोड़ने की रणनीति अपनाई गई।
नियंत्रित रिहाई और वैज्ञानिक निगरानी
23 अप्रैल 2025 को पंजाब के पिंजौर स्थित वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर से 15 गंभीर रूप से संकटग्रस्त लॉन्ग-बिल्ड गिद्धों को मेलघाट के सोमठाना रेंज में लाया गया। उन्हें एक बड़ी एवियरी में धीरे-धीरे प्राकृतिक पर्यावरण के लिए अनुकूलित किया गया।
दिसंबर 2025 में गिद्धों को GSM और सैटेलाइट ट्रांसमीटर से लैस किया गया ताकि उनके व्यवहार, प्रवास और जीवित रहने की दर को ट्रैक किया जा सके। 2 जनवरी 2026 को इन गिद्धों को जंगल में ‘सॉफ्ट रिलीज़’ के ज़रिए छोड़ा गया और प्रारंभिक समय में वैकल्पिक आहार उपलब्ध कराकर उन्हें प्राकृतिक रूप से शिकार के लिए प्रेरित किया गया।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत में गिद्धों की जनसंख्या में भारी गिरावट का मुख्य कारण डाइक्लोफेनाक जैसी पशु औषधियों का प्रयोग था।
- BNHS भारत में कई गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र संचालित करता है।
- ‘Soft Release’ तकनीक में गिद्धों को पहले एक नियंत्रित माहौल में रखा जाता है, फिर उन्हें धीरे-धीरे जंगल में छोड़ा जाता है।
- मेलघाट और ताडोबा जैसे टाइगर रिज़र्व अब गिद्ध बहाली के प्रमुख स्थल बनते जा रहे हैं।
भविष्य की दिशा और पारिस्थितिक संकेत
संरक्षण वैज्ञानिकों का मानना है कि मेलघाट में कैप्टिव-रिलीज़ गिद्धों और प्रवासी हिमालयन ग्रिफॉन के बीच बढ़ता पारस्परिक संपर्क इस क्षेत्र की पारिस्थितिक स्वीकार्यता को दर्शाता है। BNHS वर्तमान में देशभर के प्रजनन केंद्रों और रिलीज़ स्थलों पर लगभग 700 गिद्धों का प्रबंधन कर रहा है।
वर्ष 2025–26 के दौरान ही मेलघाट, पेंच और ताडोबा में कुल 34 गिद्धों को नियंत्रित तरीके से छोड़ा गया है, जिससे मध्य भारत में गिद्धों की दीर्घकालिक पुनर्बहाली की उम्मीदें बलवती हो गई हैं। यह पहल न केवल गिद्धों के लिए बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है।