महाराष्ट्र के हिंगनघाट में 12वीं सदी के मंदिर स्तंभ के अवशेष मिले

महाराष्ट्र के हिंगनघाट में 12वीं सदी के मंदिर स्तंभ के अवशेष मिले

महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट शहर में वेना नदी के किनारे 12वीं सदी के मंदिर शैली के पत्थर के स्तंभ के अवशेष मिलने की खबर सामने आई है। यह स्थान नागपुर से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित है। इस खोज को मध्यकालीन काल में इस क्षेत्र के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के नए प्रमाण के रूप में देखा जा रहा है।

वेना नदी के किनारे हुई खोज

इन पत्थर के अवशेषों की पहचान मूर्ति शोधकर्ता पंचशील थूल ने वेना नदी के किनारे प्राचीन मंदिर स्थलों के अध्ययन के दौरान की। शुरुआत में ये पत्थर साधारण दिखाई दे रहे थे, लेकिन उनकी सतह पर मौजूद जटिल नक्काशी ने शोधकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद शोधकर्ता प्रवीण कडू के साथ संयुक्त निरीक्षण किया गया, जिसमें यह पुष्टि हुई कि इन पत्थरों की वास्तुकला विशेषताएं 12वीं सदी के सेउना (यादव) वंश काल से मेल खाती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार यह स्तंभ संभवतः किसी मंदिर के सभा मंडप का हिस्सा रहा होगा या गर्भगृह के सामने स्थापित मुख्य स्तंभ रहा होगा। एक अन्य अवशेष को मुख्य स्तंभ के आधार या पेडेस्टल के रूप में पहचाना गया है, जिससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में एक बड़ा मंदिर परिसर मौजूद रहा होगा।

हेमाडपंती शैली की झलक

ये पत्थर स्थानीय रूप से उपलब्ध काले बेसाल्ट पत्थर से बनाए गए हैं। पत्थर पर उकेरा गया कमल का सुंदर अलंकरण विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। कठोर पत्थर पर इतनी बारीक नक्काशी उस समय की उन्नत शिल्पकला को दर्शाती है।

इन अवशेषों की बनावट हेमाडपंती वास्तुकला शैली से मेल खाती है, जो 12वीं और 13वीं सदी में यादव शासनकाल के दौरान विकसित हुई थी। इस शैली की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें बड़े पत्थरों को बिना चूने के गारे के एक-दूसरे में सटीक तरीके से जोड़ा जाता था। महाराष्ट्र और विदर्भ क्षेत्र के कई मध्यकालीन मंदिरों में यह शैली देखने को मिलती है।

हिंगनघाट का ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकारों के अनुसार यादव शासनकाल के दौरान विदर्भ क्षेत्र सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र था। ऐतिहासिक स्रोतों में वेना नदी के किनारे बसे नगरों और मंदिरों का उल्लेख मिलता है।

इससे यह संभावना मजबूत होती है कि उस समय हिंगनघाट एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा। वर्तमान खोज इस ऐतिहासिक परंपरा के नए पुरातात्विक प्रमाण प्रस्तुत करती है।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • सेउना या यादव वंश ने 12वीं से 13वीं सदी के दौरान दक्कन के बड़े हिस्से पर शासन किया था।
  • हेमाडपंती वास्तुकला शैली में बड़े पत्थरों को बिना चूने के गारे के जोड़कर संरचनाएं बनाई जाती थीं।
  • काला बेसाल्ट दक्कन क्षेत्र में पाया जाने वाला कठोर ज्वालामुखीय पत्थर है, जिसका उपयोग मंदिर निर्माण में व्यापक रूप से होता था।
  • गर्भगृह हिंदू मंदिर का सबसे पवित्र भाग होता है, जहां मुख्य देवता की प्रतिमा स्थापित होती है।

शोधकर्ताओं ने इन अवशेषों की सुरक्षा के लिए स्थानीय नगरपालिका परिषद और अधिकारियों को जानकारी दी है। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से वैज्ञानिक अध्ययन और उत्खनन कराने की मांग भी की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यवस्थित खुदाई की जाए तो हिंगनघाट क्षेत्र में और भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक अवशेष मिल सकते हैं। स्थानीय नागरिकों ने इन धरोहरों के संरक्षण और अध्ययन के लिए एक छोटे संग्रहालय की स्थापना की भी मांग की है, जिससे क्षेत्र में पर्यटन और विरासत जागरूकता को बढ़ावा मिल सके।

Originally written on March 4, 2026 and last modified on March 4, 2026.

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