महाराष्ट्र के सह्याद्रि में मिला दुर्लभ भूमिगत उभयचर “Gegeneophis valmiki”: भारत की जैव विविधता में नया आयाम
भारतीय वैज्ञानिकों ने महाराष्ट्र के उत्तरी पश्चिमी घाट (Western Ghats) में एक दुर्लभ भूमिगत उभयचर प्रजाति की खोज की है, जिसका नाम “Gegeneophis valmiki” रखा गया है। यह खोज भारत की जैव विविधता में एक महत्वपूर्ण योगदान है और इसे अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Phyllomedusa में प्रकाशित किया गया है।
सह्याद्रि की वाल्मीकि पठार में खोज
इस नई प्रजाति को पहली बार वर्ष 2017 में महाराष्ट्र के सतारा जिले की वाल्मीकि पठार में प्राणी सर्वेक्षण के दौरान एकत्र किया गया था। यह क्षेत्र पश्चिमी घाट का हिस्सा है, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है। इस खोज से यह स्पष्ट होता है कि पश्चिमी घाट की कम अध्ययनित पठारी पारिस्थितिक तंत्र कितनी अद्भुत और समृद्ध जैव विविधता को संजोए हुए हैं।
Gegeneophis valmiki की विशेषताएँ
यह प्रजाति Gegeneophis वंश से संबंधित है, जिन्हें सामान्यतः ब्लाइंड सीसिलियन (blind caecilians) कहा जाता है। ये उभयचर जीव अपना अधिकांश जीवन जमीन के भीतर बिताते हैं, जिससे इनका अध्ययन करना अत्यंत कठिन होता है। इनकी आंखें अत्यंत छोटी होती हैं और हड्डी के नीचे छिपी रहती हैं। इनका शरीर कीड़े के समान होता है, जिस कारण इन्हें अक्सर केचुएं समझ लिया जाता है। इनकी fossorial lifestyle (भूमिगत जीवन शैली) इन्हें लंबे समय तक वैज्ञानिक निगाहों से ओझल बनाए रखती है।
नामकरण और वैज्ञानिक महत्त्व
इस नई प्रजाति का नाम वाल्मीकि ऋषि के मंदिर के सम्मान में रखा गया है, जो खोज स्थल के पास स्थित है। ज़ूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI) के वरिष्ठ वैज्ञानिक के. पी. दिनेश के अनुसार, इस तरह की छुपी हुई प्रजातियों को दस्तावेज़बद्ध करना एक दीर्घकालिक क्षेत्रीय सर्वेक्षण और विशेषज्ञ टैक्सोनोमिक ज्ञान की मांग करता है। यह खोज वैश्विक उभयचर वर्गीकरण (taxonomy) में भारत के योगदान को मज़बूती देती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- पश्चिमी घाट एक यूनेस्को सूचीबद्ध वैश्विक जैव विविधता हॉटस्पॉट है।
- सीसिलियन (Caecilians) बिना पैरों वाले उभयचर होते हैं जो भूमिगत जीवन के लिए अनुकूलित होते हैं।
- ZSI (Zoological Survey of India) भारत का प्रमुख प्राणी शोध संस्थान है।
- वैश्विक स्तर पर लगभग 41% उभयचर प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं।
संरक्षण की आवश्यकता और चेतावनी
ZSI की निदेशक धृति बनर्जी ने कहा कि कई उभयचर प्रजातियाँ वैज्ञानिक रूप से वर्णित होने से पहले ही विलुप्त हो सकती हैं। उभयचर जीव आज विश्व के सबसे अधिक संकटग्रस्त कशेरुकी वर्गों में से एक हैं। इसलिए इनका समय पर पहचानना और दस्तावेज़ीकरण करना आवश्यक है, जिससे वैज्ञानिकों द्वारा “मूक विलुप्ति” (silent extinctions) कहे जाने वाले संकट को रोका जा सके।
निष्कर्ष
“Gegeneophis valmiki” की खोज यह सिद्ध करती है कि भारत की पारिस्थितिक विविधता में अभी भी कई ऐसे रहस्य छिपे हैं जो शोध और संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। यह खोज न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरणीय नीति और जैव विविधता संरक्षण के लिए भी एक जागरूकता और कार्रवाई का आह्वान है।