महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मिली नई ट्रैपडोर मकड़ी की प्रजाति: खतरे में घासभूमि की जैव विविधता

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मिली नई ट्रैपडोर मकड़ी की प्रजाति: खतरे में घासभूमि की जैव विविधता

महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के घासभूमि क्षेत्र में ट्रैपडोर मकड़ी की एक नई प्रजाति की खोज ने न केवल इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को उजागर किया है, बल्कि इस नाजुक पारिस्थितिक तंत्र पर मंडराते खतरों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। इस खोज ने तेजी से हो रहे मानवीय विकास और पारिस्थितिक बदलावों के बीच विलुप्ति के खतरे में पड़ी एक नई प्रजाति को पहचान दिलाई है।

वैज्ञानिक वर्गीकरण और खोज की पृष्ठभूमि

इस नई प्रजाति को Titanidiops kolhapurensis नाम दिया गया है, जो इसके खोज-स्थान कोल्हापुर पर आधारित है। यह शोध 4 फरवरी को यूनाइटेड किंगडम स्थित “जर्नल ऑफ नैचुरल हिस्ट्री” में प्रकाशित हुआ।

इस अनुसंधान का नेतृत्व “ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन” और “शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर” की संयुक्त टीम ने किया। यह खोज सतपाल गांगलमाले के पीएचडी शोध का हिस्सा है, जिन्हें कीटविज्ञानी सुनील गायकवाड का मार्गदर्शन प्राप्त है।

कोल्हापुर की ‘डार्क स्पाइडर’ की विशेषताएँ

ट्रैपडोर मकड़ियों को स्थानीय मराठी में “डारकरी कोळी” कहा जाता है। ये मकड़ियाँ ज़मीन में लंबवत या ढलान वाली सुरंग बनाकर उसके ऊपर छुपा हुआ ढक्कन तैयार करती हैं, जिससे उनका निवास स्थान लगभग अदृश्य हो जाता है।

इस प्रजाति की पहचान Titanidiops वंश के अंतर्गत की गई, जिसमें उनके दाँतों की रचना और आठ आँखों की विशेष व्यवस्था जैसे लक्षण निर्णायक रहे।

सीमित आवास और वितरण

अब तक यह प्रजाति केवल कुछ ही क्षेत्रों में पाई गई है — जिनमें शिवाजी विश्वविद्यालय परिसर, शेंडा पार्क, कोल्हापुर चित्रनगरी क्षेत्र और पूईखडी हिल शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने प्राकृतिक घासभूमि और देशज वनों में इस प्रजाति की अच्छी उपस्थिति दर्ज की, लेकिन ग्लिरिसिडिया सेपियम (स्थानीय नाम “उंदरमारी”) जैसे विदेशी पौधों की घनी बस्तियों में यह पूरी तरह अनुपस्थित रही।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • ट्रैपडोर मकड़ियाँ मकड़ियों की प्राचीन वंशावली में आती हैं।
  • Titanidiops kolhapurensis महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में खोजी गई है।
  • विदेशी पौधों की वृक्षारोपण स्थानीय जैव विविधता के लिए हानिकारक हो सकती है।
  • घासभूमियाँ पारिस्थितिकी की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर उपेक्षित पारिस्थितिक तंत्र होती हैं।

संरक्षण की चुनौतियाँ और चेतावनी

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस नई प्रजाति का अस्तित्व सीधे तौर पर देशज घासभूमियों की स्थिति पर निर्भर करता है। शहरी विस्तार, निर्माण गतिविधियाँ, गहन कृषि और विदेशी पेड़ों के विस्तार के कारण कोल्हापुर क्षेत्र की पारिस्थितिकी तेजी से बदल रही है।

यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो Titanidiops kolhapurensis जैसी नई खोजी गई प्रजातियाँ जल्द ही विलुप्ति के कगार पर पहुँच सकती हैं। यह खोज एक बार फिर याद दिलाती है कि सिर्फ वनों का ही नहीं, बल्कि घासभूमियों जैसे नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों का भी संरक्षण अत्यावश्यक है।

Originally written on February 9, 2026 and last modified on February 9, 2026.

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