मलाबार ग्लाइडिंग मेंढक: पश्चिमी घाटों का उड़ता हुआ अजूबा
भारत के पश्चिमी घाटों के सघन वनों में पाया जाने वाला मलाबार ग्लाइडिंग मेंढक अपनी चमकीली हरी रंगत, हवा में फिसलने की क्षमता और अनोखी प्रजनन विधि के लिए प्रसिद्ध है। यह मेंढक अन्य प्रजातियों की तरह पानी में अंडे देने के बजाय झीलों और नालों के ऊपर शाखाओं पर झूलते झागदार घोंसले बनाता है। यह उसकी वृक्षीय जीवनशैली के लिए विकसित एक अनूठी अनुकूलन रणनीति है।
वृक्षों के बीच जीवन जीने वाला मेंढक
मलाबार ग्लाइडिंग मेंढक पेड़ों की ऊँचाइयों पर जीवन बिताने के लिए पूरी तरह अनुकूलित है। अपनी झिल्लीदार उँगलियों को फैलाकर यह एक शाखा से दूसरी शाखा तक फिसल सकता है। यह क्षमता उसे शिकारियों से बचने, साथी खोजने और सुरक्षित घोंसले तक पहुँचने में मदद करती है। इसका पूरा जीवनचक्र पेड़ों की ऊपरी परतों में व्यतीत होता है, जहाँ से यह केवल प्रजनन के समय ही नीचे के जल स्रोतों से जुड़ता है।
झागदार घोंसलों की अनोखी प्रजनन प्रक्रिया
बरसात के मौसम के आगमन के साथ ही यह मेंढक अपना विशेष प्रजनन व्यवहार दिखाता है। मादा मेंढक तालाब या जलधारा के ऊपर लटकती किसी शाखा या पत्ते का चयन करती है, जबकि नर अम्प्लेक्सस (amplexus) स्थिति में उससे जुड़ जाता है। दोनों मिलकर लगभग तीन इंच चौड़ा सफेद झागदार घोंसला तैयार करते हैं। यह झाग एक सुरक्षात्मक परत की तरह काम करता है, जो लगभग 200 अंडों को धूप, शिकारियों और सूखने से बचाता है। यह प्राकृतिक ऊँचा इनक्यूबेटर अंडों की सुरक्षा और विकास के लिए अत्यंत उपयोगी होता है।
झाग से पानी तक: टैडपोल्स की सुरक्षित यात्रा
जब अंडे फूटते हैं, तो टैडपोल्स उस झागदार घोंसले से फिसलकर नीचे के पानी में गिर जाते हैं। यह प्रक्रिया गुरुत्वाकर्षण के सहारे स्वाभाविक रूप से होती है, जिससे टैडपोल्स सुरक्षित रूप से जल में प्रवेश कर पाते हैं। पानी में वे अपना विकास जारी रखते हैं और कुछ समय बाद छोटे मेंढक बनकर फिर से पेड़ों पर लौट आते हैं।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- मलाबार ग्लाइडिंग मेंढक झीलों और धाराओं के ऊपर झूलते झागदार घोंसले बनाता है।
- एक घोंसले में लगभग 200 अंडे सुरक्षित रहते हैं।
- यह मेंढक अपनी झिल्लीदार उँगलियों से हवा में फिसल सकता है।
- टैडपोल्स झाग से गिरकर नीचे के पानी में विकास करते हैं।
पारिस्थितिक महत्त्व और संरक्षण की आवश्यकता
मलाबार ग्लाइडिंग मेंढक पश्चिमी घाटों के पारिस्थितिक संतुलन का एक संवेदनशील सूचक है। यह केवल स्वच्छ जल और स्वस्थ वन्य वातावरण में ही पनप सकता है। इसकी उपस्थिति स्थानीय पारिस्थितिकी की स्थिरता को दर्शाती है। लेकिन वनों की कटाई, प्रदूषण और आवास के विनाश जैसी समस्याएँ इस प्रजाति के अस्तित्व पर खतरा डाल रही हैं। इस मेंढक की सुरक्षा केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि भारत के सबसे समृद्ध जैव-विविध क्षेत्रों में से एक पश्चिमी घाट की पारिस्थितिक सुरक्षा का प्रतीक भी है।