मद्रास हेजहॉग: अनोखी प्रजाति के जीनोम से मिले नए संकेत

मद्रास हेजहॉग: अनोखी प्रजाति के जीनोम से मिले नए संकेत

हाल ही में मद्रास हेजहॉग के संपूर्ण माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का पहला विस्तृत विश्लेषण किया गया है, जिससे इस कम ज्ञात प्रजाति के विकासक्रम और आनुवंशिक संरचना को समझने में नई जानकारी मिली है। यह अध्ययन न केवल इसके विकासवादी इतिहास को स्पष्ट करता है, बल्कि इसके अनूठे अनुकूलन और पारिस्थितिक महत्व को भी उजागर करता है। भारत के शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली यह प्रजाति अब वैज्ञानिक दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण बन गई है।

मद्रास हेजहॉग का परिचय

मद्रास हेजहॉग, जिसका वैज्ञानिक नाम पैराएकिनस न्यूडिवेंट्रिस है, एक छोटा स्तनधारी जीव है जो मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में पाया जाता है। इसे स्थानीय भाषा में “मुल्लेली” और अंग्रेज़ी में “बेयर-बेलीड हेजहॉग” भी कहा जाता है। इसकी खोज 1851 में हुई थी। यह प्रजाति शुष्क झाड़ीदार क्षेत्रों, कांटेदार जंगलों, घासभूमियों और कृषि क्षेत्रों के किनारों पर निवास करती है। इसका वितरण तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों तक सीमित है, जिससे यह एक स्थानिक (एंडेमिक) प्रजाति बनती है।

शारीरिक और व्यवहारिक विशेषताएं

मद्रास हेजहॉग की पीठ पर नुकीले कांटे होते हैं, जो इसे शिकारी जीवों से बचाने में मदद करते हैं, जबकि इसके पेट की ओर मुलायम सफेद फर होता है। यह मुख्य रूप से रात्रिचर (नॉक्टर्नल) जीव है और खतरे की स्थिति में अपने शरीर को गोलाकार बना लेता है। लोमड़ी, सियार और नेवला जैसे शिकारी इसके प्रमुख शत्रु हैं। यह प्रजाति शुष्क और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखती है, जो इसकी अनुकूलन क्षमता को दर्शाता है।

आहार और पारिस्थितिक भूमिका

मद्रास हेजहॉग मुख्य रूप से कीटभक्षी है। यह बीटल, चींटी, दीमक और केंचुओं के साथ-साथ कुछ वनस्पति पदार्थ भी खाता है। यह कीटों की संख्या को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ होता है। इसके अलावा, यह मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी योगदान देता है, जिससे जैव विविधता को बनाए रखने में मदद मिलती है।

खतरे और संरक्षण स्थिति

हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने इसे “कम चिंता” (Least Concern) श्रेणी में रखा है, फिर भी यह प्रजाति स्थानीय स्तर पर कई खतरों का सामना कर रही है। पारंपरिक मान्यताओं के कारण इसके कांटों और मांस के लिए शिकार किया जाता है। इसके अलावा, कृषि विस्तार के कारण इसके प्राकृतिक आवास में कमी आ रही है। ऐसे में हाल के जीनोम अध्ययन जैसे शोध इस प्रजाति के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण दिशा प्रदान कर सकते हैं।

खबर से जुड़े जीके तथ्य

  • मद्रास हेजहॉग प्रायद्वीपीय भारत की एक स्थानिक प्रजाति है।
  • इसका वैज्ञानिक नाम पैराएकिनस न्यूडिवेंट्रिस है।
  • यह मुख्य रूप से रात्रिचर और कीटभक्षी जीव है।
  • आईयूसीएन के अनुसार इसकी संरक्षण स्थिति “कम चिंता” श्रेणी में है।

मद्रास हेजहॉग पर किया गया यह नया वैज्ञानिक अध्ययन इसके संरक्षण और प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यह प्रजाति न केवल जैव विविधता का हिस्सा है, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है।

Originally written on April 10, 2026 and last modified on April 10, 2026.

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