भिरड़ाना के साक्ष्य से सिंधु सभ्यता की प्राचीनता पर नया संकेत
ताज़ा पुरातात्त्विक अनुसंधान से संकेत मिलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता की उत्पत्ति पहले माने गए समय से कहीं अधिक प्राचीन हो सकती है। उत्तरी भारत स्थित भिरड़ाना स्थल से प्राप्त रेडियोकार्बन तिथि-निर्धारण के अनुसार इस क्षेत्र में संगठित बस्तियां लगभग 8,000 वर्ष पूर्व विकसित हो चुकी थीं। यदि यह निष्कर्ष व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, तो यह मिस्र के प्रारंभिक फ़राओ युग से भी पहले की कालरेखा प्रस्तुत करेगा और प्राचीन सभ्यताओं के इतिहास को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।
भिरड़ाना से मिले नए प्रमाण
शोधकर्ताओं ने भिरड़ाना की गहरी सांस्कृतिक परतों से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों और पशु अवशेषों का परीक्षण किया। रेडियोकार्बन विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यहां मानव बसावट लगभग 9,000 वर्ष पूर्व तक जा सकती है। निष्कर्षों के अनुसार प्रारंभिक कृषक समुदाय सिंधु सभ्यता के परिपक्व नगरीय चरण से हजारों वर्ष पहले विकसित हो चुके थे।
परंपरागत रूप से सिंधु घाटी सभ्यता, जिसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, का काल 2600 से 1900 ईसा पूर्व माना जाता है। नए प्रमाण इसके आरंभिक चरण को और पीछे ले जाते हैं, जिससे यह धारणा मजबूत होती है कि यह सभ्यता अचानक नहीं उभरी, बल्कि दीर्घकालीन सांस्कृतिक विकास का परिणाम थी।
नगरीय नियोजन और सामाजिक संरचना
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे प्रमुख स्थलों पर उन्नत शहरी नियोजन के प्रमाण मिलते हैं। सड़कों को ग्रिड पैटर्न में व्यवस्थित किया गया था तथा अधिकांश घरों में कुएं, आंगन और स्नान मंच बने हुए थे। सड़कों के नीचे ढंकी हुई जलनिकासी व्यवस्था प्राचीन विश्व की सबसे शुरुआती संगठित स्वच्छता प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
विशाल अन्नागार, गोदी स्थल, मानकीकृत तोल-माप और मुहरें जटिल व्यापारिक और प्रशासनिक ढांचे की ओर संकेत करती हैं। मिस्र या मेसोपोटामिया के विपरीत यहां भव्य मंदिरों या राजमहलों के प्रमाण नहीं मिले हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि शासन प्रणाली संभवतः कम केंद्रीकृत रही होगी।
विस्तार और सांस्कृतिक प्रभाव
अपने उत्कर्ष काल में यह सभ्यता लगभग 50 लाख से अधिक लोगों का समर्थन कर सकती थी। इसका विस्तार अरब सागर से लेकर वर्तमान उत्तर-पश्चिम भारत तक फैला था, जिससे यह प्राचीन विश्व की सबसे व्यापक सांस्कृतिक इकाइयों में से एक बन गई।
रत्नों की मनके, तांबा और कांस्य उपकरण तथा अब तक अपठित लिपि वाली मुहरें तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक एकरूपता को दर्शाती हैं। मानकीकृत तोल-माप प्रणाली संगठित व्यापार नेटवर्क का प्रमाण देती है।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- सिंधु घाटी सभ्यता कांस्य युग की प्रमुख सभ्यता थी।
- प्रमुख नगरों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा और राखीगढ़ी शामिल हैं।
- सिंधु लिपि अब तक अपठित है।
- मानकीकृत तोल-माप प्राचीन व्यापारिक संगठन का संकेत देते हैं।
पतन और अनुकूलन पर बहस
पूर्व में यह माना जाता था कि जलवायु परिवर्तन और कमजोर होते मानसून के कारण इस सभ्यता का पतन हुआ। नदियों के मार्ग परिवर्तन और लंबे सूखे ने कृषि और व्यापार को प्रभावित किया होगा। हालांकि भिरड़ाना के प्रमाण यह दर्शाते हैं कि पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के रूप में सामने आया।
समुदायों ने गेहूं और जौ जैसी जल-आधारित फसलों से हटकर बाजरा और चावल जैसी सूखा-प्रतिरोधी फसलों को अपनाया। पर्यावरणीय दबाव, प्रवासन और सामाजिक बदलाव जैसे कारकों पर अभी भी शोध जारी है। नए निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन नगरीय संस्कृतियों में से एक की जड़ें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक गहरी हो सकती हैं।