भारत सरकार द्वारा चीनी कंपनियों पर निवेश प्रतिबंधों में ढील: पुनः प्रस्तावित सार्वजनिक ठेका नीति
भारत सरकार ने पांच साल पुराने उन प्रतिबंधों को उठाने की तैयारी शुरू कर दी है जिनके तहत चीनी कंपनियों को सरकारी ठेकों में बोली लगाने से रोका गया था। इस प्रस्तावित कदम के तहत अब चीनी कंपनियों को सार्वजनिक खरीद (Public Procurement) में पुनः भाग लेने की अनुमति मिल सकती है, जिसका अनुमानित मूल्य लगभग 700–750 अरब डॉलर है। यह नीति बदलाव ऐसे समय में सामने आया है जब भारत–चीन सीमा तनाव में कुछ शिथिलता देखने को मिली है और द्विपक्षीय आर्थिक रिश्तों में संविदात्मक पुनर्संतुलन की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।
भारत सरकार ने 2020 में सीमा पर हिंसक झड़पों के बाद यह प्रतिबंध लागू किए थे। उस समय की परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक कारणों के साथ यह कदम उठाया गया ताकि महत्वपूर्ण सरकारी परियोजनाओं और बुनियादी ढांचा निर्माण में रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखा जा सके। अब प्रस्तावित नीति बदलाव के समर्थन में वित्त मंत्रालय प्रमुख भूमिका निभा रहा है, लेकिन अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री के कार्यालय द्वारा लिया जाना बाकी है।
2020 के प्रतिबंधों का पृष्ठभूमि
2020 में भारत–चीन सीमा पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) और पीएलए (PLA) के बीच लाठीचार्ज और गोलीबारी जैसी भयानक झड़पों के पश्चात, भारत सरकार ने चीनी कंपनियों के लिए सरकारी ठेकों में हिस्सेदारी सीमित कर दी थी। इन नियमों के अंतर्गत चीनी कंपनियों को सरकारी निविदाओं (Tenders) में भाग लेने से पहले एक उच्च स्तरीय पैनल के साथ पंजीकरण और राजनीतिक तथा सुरक्षा मंजूरी आवश्यक थी। इस प्रक्रिया ने अधिकांश चीनी कंपनियों को भारतीय सार्वजनिक ठेकों से अप्रत्यक्ष रूप से बाहर कर दिया, विशेषकर परिवहन, ऊर्जा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में।
इस पैनल की अध्यक्षता कभी-कभी पूर्व कैबिनेट सचिव द्वारा की जाती थी, और इसके सामने सुरक्षा सम्बन्धित जोखिमों का विश्लेषण आवश्यक था। इसके फलस्वरूप, चीनी कंपनियों की भागीदारी न के बराबर रह गई, जिससे सार्वजनिक परियोजनाओं के कार्य में कमी, उत्पादन शृंखलाओं में बाधा और लागत में वृद्धि देखी गई।
प्रस्तावित बदलाव और निर्णय प्रक्रिया
सरकार के सूत्रों के अनुसार, अब नीति निर्माताओं द्वारा अनिवार्य पंजीकरण और पूर्व-स्टीयरिंग अनुमोदन आवश्यकताओं को हटाने पर विचार किया जा रहा है। इससे चीनी कंपनियों को भारतीय सार्वजनिक बोली प्रक्रियाओं में सामान्य रूप से भाग लेने की अनुमति मिल सकती है। यह प्रस्ताव वित्त मंत्रालय की पहल है और इस पर विभिन्न विभागों से प्रतिक्रिया ली जा रही है, जिनका कहना है कि प्रतिबंधों के कारण आवश्यक सामग्री की कमी, उच्च लागत और परियोजना देरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं।
हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि इस प्रस्तावित बदलाव से चीनी कंपनियों पर सभी प्रतिबंध समाप्त नहीं होंगे। विशेष रूप से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) संबंधी रोकें जो पहले लागू की गई थीं, वे अब भी प्रभाव में हैं। अतः रणनीतिक क्षेत्रों में चीन के निवेश पर रोक बनी रहेगी।
आर्थिक प्रभाव और क्षेत्रीय चिंताएँ
2020 के प्रतिबंधों के कारण भारत की औद्योगिक परियोजनाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा था। उदाहरण के तौर पर चीनी सरकारी कंपनी CRRC को लगभग 216 मिलियन डॉलर के ट्रेन निर्माण अनुबंध से बाहर कर दिया गया था। इसी प्रकार बिजली संयंत्र उपकरणों के आयात पर भी रोक लगने के कारण भारतीय ऊर्जा उन्नयन योजनाओं में भी बाधा आई। इस प्रकार प्रतिबंधों की घोषणा के बाद चीनी बोलीदाताओं को दिए गए नए अनुबंधों का मूल्य 2021 में लगभग 27 प्रतिशत घटकर 1.67 अरब डॉलर रह गया था, जैसा एक 2024 के रिपोर्ट में उल्लेख किया गया।
इन प्रभावों ने भारत के थर्मल पावर क्षमता विस्तार योजनाओं को लगभग 307 गीगावाट तक पहुँचाने के लक्ष्य को धीमा कर दिया।
विदेश नीति और द्विपक्षीय संबंधों का व्यापक संदर्भ
यह नीति बदलाव ऐसे समय में प्रस्तावित हो रहा है जब भारत और चीन के बीच सीमा तनाव पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षाकृत कम हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की चीन यात्रा के बाद दोनों देशों ने वाणिज्यिक सम्बन्धों को पुनर्जीवित करने पर सहमति जताई थी। इस यात्रा के फलस्वरूप दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष उड़ानें पुनः शुरू की गईं और चीनी पेशेवरों के लिए वीज़ा प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया।
फिर भी, भारत एक सतर्क दृष्टिकोण अपनाए हुए है, जिसमें आर्थिक यथार्थ और रणनीतिक चिंताओं को संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। वैश्विक व्यापार गतिशीलता और अमेरिकी शुल्क नीतियों के बदलते परिदृश्य के मद्देनज़र यह आवश्यक है कि भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित करे।
खबर से जुड़े जीके तथ्य
- भारत ने चीनी कंपनियों पर सार्वजनिक ठेकों में बोली लगाने पर 2020 में प्रतिबंध लगाए थे।
- अनुमानित 700–750 अरब डॉलर के सरकारी ठेकों का क्षेत्र इस नीति बदलाव से प्रभावित हो सकता है।
- FDI (विदेशी प्रत्यक्ष निवेश) के प्रतिबंध अभी भी लागू रहेंगे।
- 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में चीनी बोलीदाताओं को मिले नए अनुबंधों का मूल्य लगभग 27% घटा।
भारत की सार्वजनिक ठेका नीति में संभावित ढील चीन के साथ आर्थिक बातचीत के एक नए अध्याय का संकेत देती है, जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग को एक स्थिर और लाभप्रद दिशा मिल सकती है।